2 जून को अमेरिकी वेबसाइट Axios ने Morning Consult के एक वैश्विक सर्वेक्षण पर आधारित रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें यह दावा किया गया कि अमेरिका की मौजूदा व्यापार नीति “चीन को फिर से महान बना रही है”, और इसी के चलते अमेरिका की वैश्विक छवि में गिरावट आ रही है।
इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में आ रहे गहरे और निर्णायक बदलावों की ओर ध्यान खींचा है। सर्वे के अनुसार, मई 2025 के अंत तक चीन की शुद्ध वैश्विक अनुकूलता +8.8 रही, जबकि अमेरिका की गिरकर -1.5 पर पहुंच गई। यह पहली बार है जब चीन इस मामले में अमेरिका से आगे निकल गया है।
यह परिवर्तन केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह दो विरोधी वैश्विक दृष्टिकोणों की टक्कर का नतीजा है। एक ओर, अमेरिका की ‘संरक्षणवाद’ नीतियों ने उसके अपने सहयोगियों को भी असहज कर दिया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा अप्रैल में लगाए गए “पारस्परिक टैरिफ़” न केवल अमेरिकी नागरिकों की जेब पर भारी पड़े- हर परिवार पर औसतन 1300 डॉलर सालाना का बोझ बढ़ा- बल्कि 35 देशों की ओर से जवाबी कार्रवाइयां भी शुरू हो गईं।
नतीजतन, मेक्सिको ने ब्रिक्स में शामिल होने की प्रक्रिया तेज़ कर दी और आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने अमेरिका की 2025 की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 2.2% से घटाकर 1.6% कर दिया। विश्व व्यापार संगठन ने अमेरिका पर गैर-भेदभाव सिद्धांत के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए चेताया है कि इससे वैश्विक व्यापार 1% तक सिकुड़ सकता है।
दूसरी तरफ, चीन ने वैश्विक शासन के क्षेत्र में निरंतर स्थिरता और ज़िम्मेदारी का प्रदर्शन किया है। गाजा युद्धविराम को लेकर की गई पहल से लेकर यूक्रेन संकट पर छह-सूत्रीय प्रस्ताव तक, चीन को 100 से अधिक देशों का समर्थन मिला है। आर्थिक मोर्चे पर, बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) अब तक 155 देशों को जोड़ चुका है। डी-ग्लोबलाइजेशन के माहौल के बावजूद, चीन का इन देशों के साथ व्यापार 6.4% बढ़ा है। सबसे कम विकसित देशों के लिए 100% शून्य टैरिफ ने चीन की साझा समृद्धि की सोच को साकार किया है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो, लाओस-चीन रेलवे परियोजना के चलते माल परिवहन समय 10 दिन से घटकर 3 दिन रह गया है। यह स्पष्ट संकेत है कि चीन की विकास परियोजनाएं धरातल पर सकारात्मक असर डाल रही हैं। सऊदी अरब और ईरान के बीच सुलह में चीन की भूमिका ने इस्लामी दुनिया को चीनी कूटनीति की गहराई का अनुभव कराया है।
यह बदलाव कोई संयोग नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की सामूहिक चेतना का प्रमाण है। अमेरिका जहां अब भी सहयोगी देशों की जासूसी कर अपनी नैतिक साख खो रहा है, वहीं स्विट्ज़रलैंड और सिंगापुर जैसे पारंपरिक रूप से तटस्थ देश भी अब चीन को फ्रांस जैसे पश्चिमी देशों से अधिक सकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं। अमेरिका के कई थिंक टैंक भी मानते हैं कि चीन की विकास की मांगें आज के युग की वास्तविक जरूरतों से मेल खाती हैं।
जर्मनी में वोक्सवैगन की आपूर्ति श्रृंखला का चीन की ओर पुनर्गठन और मैक्सिको का ब्रिक्स में शामिल होने का निर्णय- ये सब एक उभरते नए वैश्विक सभ्यता चक्र की आहट हैं, जिसमें सह-अस्तित्व और साझी जीत की भावना प्रमुख है। ऐसे में, 2025 के इस सर्वेक्षण को एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा सकता है, जो एकध्रुवीय अमेरिकी प्रभुत्व से बहुपक्षीय वैश्विक सहभागिता की ओर संक्रमण को चिन्हित करता है।
(साभार-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

