Site icon Dainik Savera Times

चीन का गरीबी उन्मूलन मॉडल: विकासशील विश्व के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत

China News

China News

“दस फुट रेशम और बीस फुट लाल जाली,
वही दाम उन्होंने बैल के सिर पर बाँध दिया!”
– बूढ़ा कोयला बेचने वाला, पाई चुयी

थांग राजवंश के प्रसिद्ध चीनी कवि पाई चुयी (Bai Juyi-白居易) की कविता “बूढ़ा कोयला बेचने वाला” (“The Old Charcoal Seller”) गरीबी और वंचना की दो दारुण तस्वीरों पर तीखा प्रकाश डालती है। दक्षिण की पहाड़ियों पर उस बूढ़े ने हाड़ कँपा देने वाली सर्दी, भूख और थकान की अकथनीय पीड़ा झेली। मगर शाही महल के दो दरबारियों ने उसे जीवन की बुनियादी ज़रूरतों से भी वंचित कर दिया। गाड़ी भर कोयले के बदले उसे न तो दाम मिला जिससे वह भूख की आग बुझा सके, न ही पीड़ा से राहत देने वाली खुशी का कोई जरिया। उसके दुखों की गाथा आँसुओं से भी गहरी है।

एक हज़ार साल बीत गए, फिर भी उस बूढ़े कोयला बेचने वाले की करुण कथा यही याद दिलाती है: दुनिया का हर देश आज भी भूख, गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहा है। इनका उन्मूलन ही पूरी मानवता का सबसे सार्थक कार्य है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, 2025 में विश्व भर में 80.8 करोड़ लोग घोर गरीबी में जीवन बिता रहे थे।

विकास से पूर्ण गरीबी पर विजय: चीन की चार दशक की यात्रा

1949 में नए चीन की स्थापना के बाद से चीनी नेताओं की कई पीढ़ियों ने “पूरी लगन से लोगों की सेवा करने” के लिए अथक प्रयास किए हैं। यह आदर्श सीपीसी के शासन के हर कदम में झलकता है। 16 से 18 जून 2015 को क्वेइचो (Guizhou) में राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वह बात कही जो आज चीन की गरीबी-विरोधी क्रांति का मूलमंत्र बन चुकी है: “अच्छा जीवन अपने हाथों से गढ़ा जाता है, इसलिए गरीबी से डरने की कोई बात नहीं। दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास हो, तो हर मुश्किल पार हो जाती है।”

राष्ट्रपति शी बिल्कुल सही हैं। शी के कार्यकाल में अत्यधिक गरीबी उन्मूलन 2020 तक हर तरह से एक खुशहाल समाज बनाने की राह का सबसे अहम पड़ाव बन गया। गौरतलब है कि नवंबर 2013 में ही राष्ट्रपति शी ने पहली बार लक्षित गरीबी उन्मूलन की अवधारणा देश के सामने रखी थी। चीन ने मुफ़्त मदद या खैरात से नहीं, विकास के ज़रिए गरीबी को खत्म किया। इसके लिए लक्षित कार्यक्रमों का एक व्यापक जाल बिछाया गया — सड़क, बिजली और पानी जैसे बुनियादी ढाँचे से लेकर उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और आय सृजन तक। मकसद खैरात बाँटना नहीं था, बल्कि गरीबों के हाथों में वे साधन और क्षमता देना था ताकि वे खुद राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जुड़ें और अपनी शर्तों पर आजीविका कमा सकें।

1978 में सुधार और खुलेपन की शुरुआत के बाद चीन एक दिन के लिए भी नहीं रुका। 37 साल की अथक मेहनत ने करीब 70 करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला — मानव इतिहास में इतने कम समय में इतनी बड़ी आबादी का उद्धार सचमुच अभूतपूर्व है। यह महज आँकड़ा नहीं, एक सभ्यतागत छलांग है। चीन पहला विकासशील देश बना जिसने गरीबों की संख्या आधी करने का सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 2015 की समय-सीमा से पहले ही पूरा कर लिया। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस उपलब्धि को ऐतिहासिक माना है। विश्व बैंक के मुताबिक, पिछले चार दशकों में वैश्विक गरीबी घटाने में चीन का हिस्सा 75 प्रतिशत रहा। इसीलिए विश्व बैंक ने माना: “अगर घोर गरीबी खत्म करने का आखिरी पड़ाव कोई दुनिया को दिखा सकता है, तो शायद वह चीन ही है।”
2020 चीन के लिए गरीबी उन्मूलन के अपने पहले शताब्दी लक्ष्य की यात्रा में एक मील का पत्थर साबित हुआ था। 13वीं पंचवर्षीय योजना के तहत चीन ने 2020 में ही चरम गरीबी खत्म कर दी — संयुक्त राष्ट्र के 2030 के लक्ष्य से 10 साल पहले। 25 फरवरी 2021 को राष्ट्रपति शी ने अंतिम 9 करोड़ 89 लाख 90 हज़ार ग्रामीणों को भी गरीबी से मुक्त करने का ऐलान किया। इसके साथ 832 जिले और 1 लाख 28 हज़ार गाँव गरीबी सूची से हट गए। आज दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश वैश्विक गरीबी उन्मूलन का सबसे बड़ा इंजन बन चुका है। यह उपलब्धि सिर्फ आँकड़ा नहीं, बल्कि चीन के राष्ट्रीय पुनरुत्थान की नई यात्रा का अहम पड़ाव है।

चीन ने गरीबी को कैसे हराया

2020 तक शून्य-गरीबी के लिए चीन ने चीनी विशेषताओं वाले उपाय अपनाए — ज़रूरतमंद परिवारों को आर्थिक मदद, बच्चों के लिए नौ साल की अनिवार्य शिक्षा, चिकित्सा खर्च का 90 प्रतिशत कवर करने वाला सामाजिक बीमा, दुर्गम इलाकों से पुनर्वास, खेती का आधुनिकीकरण, कृषि-पर्यटन को बढ़ावा, रोज़गार-सर्वोपरि वाली समष्टि आर्थिक नीति के तहत व्यावसायिक विद्यालय, परिवहन ढाँचे का विकास, और गाँव-कस्बों में इंटरनेट-आधारित व्यापार को मजबूत करना। इन उपायों ने 1.4 अरब लोगों का जीवन कई पहलुओं में बेहतर किया। विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के अलावा, चीनी सरकार देश भर के गरीब गाँवों और कस्बों में लक्षित गरीबी उन्मूलन के लिए कई नए उपाय भी लेकर आई थी। देश ने गरीबी घटाने के प्रयासों में अपनी ‘ब्रॉडबैंड चीन’, ‘मेड इन चाइना’ और ‘इंटरनेट प्लस’ रणनीति को तेज़ी से आगे बढ़ाया था।

तथ्य और आँकड़े साफ करते थे कि एक विकासशील देश होते हुए भी चीन ने सिर्फ आठ साल में करीब 10 करोड़ लोगों को घोर गरीबी से बाहर निकाला था। 2020 के अंत तक उसने पूर्ण गरीबी को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया था, यानी संयुक्त राष्ट्र के 2030 के सतत विकास एजेंडा का गरीबी उन्मूलन लक्ष्य 10 साल पहले ही हासिल कर लिया था।
दुनिया, खासकर विकासशील देश, जिनमें से कई आज भी घोर गरीबी से जूझ रहे हैं, पिछले दशकों में गरीबी से छुटकारा पाने की चीन की ऐतिहासिक उपलब्धियों से सामाजिक उन्नति के कई सबक सीख सकते थे।

गरीबी पर चीन की जीत: भारत के लिए सबक

बिना संदेह के, चीन की गरीबी उन्मूलन की कहानी दुनिया के लिए सबक है। आठ साल में लगभग 10 करोड़ लोगों को भीषण गरीबी से बाहर निकालकर चीन ने दिखाया कि स्पष्ट लक्ष्य, जमीनी कार्यान्वयन और निरंतर निगरानी से बदलाव संभव है। आँकड़े फर्क साफ दिखाते हैं। जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा और शिशु मृत्यु दर — हर सामाजिक पैमाने पर चीन भारत से मीलों आगे है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत 123 देशों में 102वें स्थान पर है, कई पड़ोसियों से भी नीचे। संयुक्त राष्ट्र के मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स 2024 के मुताबिक, दुनिया के 1.1 अरब घोर गरीबों में से 23.4 करोड़ अकेले भारत में हैं। साल दर साल भारत के गरीबी-विरोधी कार्यक्रम बड़े हो रहे हैं, बेहतर नहीं।

चीन अपना अनुभव साझा करने को तैयार है, चाहे वह चाइना-यूएन पीस एंड डेवलपमेंट फंड हो या साउथ-साउथ कोऑपरेशन। 2026 में पेइचिंग में हुए वैश्विक गरीबी उन्मूलन और विकास मंच को चीन के गरीबी-शासन मॉडल के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली। वहीं चीन ने 53 देशों और 9 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर ‘वैश्विक गरीबी उन्मूलन और विकास साझेदारी’ (GPPAD) शुरू की, ताकि नीति-संवाद, तकनीकी सहयोग और “छोटी मगर स्मार्ट” परियोजनाओं से विकासशील देशों की क्षमता बढ़ाई जाए।

भारत की कल्याणकारी योजनाओं को इस अनुभव से बल मिल सकता है। विकासशील देशों, खासकर भारत, को चीन के चार दशकों के अडिग प्रयासों से सीखना होगा। अपनी सामाजिक-आर्थिक सच्चाई के हिसाब से चीन की मध्यम और दीर्घकालिक नीतियों को अपनाकर ही हम गरीबी को एकमुश्त अभियान नहीं, सतत प्रक्रिया बना पाएँगे। वरना बजट बढ़ता रहेगा, गरीबी भी।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— रविशंकर बसु)

Exit mobile version