इंटरनेशनल डेस्क: इस सोमवार को शनचो-23 मिशन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि चीन का मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम न केवल तकनीकी रूप से परिपक्व हो चुका है, बल्कि अब वह वैश्विक सहभागिता और वैज्ञानिक उत्कृष्टता के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। थ्येनकोंग अंतरिक्ष स्टेशन पर शनचो-21 और शनचो-23 के चालक दलों की मुलाकात, आठवीं “स्पेस फ़ैमिली फ़ोटो” और हांगकांग की पहली पेलोड विशेषज्ञ ली च्यायिंग की मौजूदगी केवल औपचारिकताएं नहीं हैं, बल्कि वे उस खुलेपन और विविधता के प्रतीक हैं, जिसे चीन अपने अंतरिक्ष अभियानों में शामिल कर रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब “सिर्फ मौजूदगी” से आगे बढ़कर “उच्च-दक्षता वैज्ञानिक उत्पादन” और “वैश्विक एकीकरण” के मॉडल पर काम कर रहा है। शनचो-23 के एवियोनिक्स सिस्टम को छोटा और अधिक कॉम्पैक्ट बनाकर पृथ्वी पर अधिक वैज्ञानिक नमूने लाने की क्षमता बढ़ाई गई है। वहीं, लेज़र रेंडेज़वस और डॉकिंग रडार जैसी स्वदेशी तकनीकों ने थ्येनकोंग अंतरिक्ष स्टेशन को अत्यधिक सटीकता के साथ विभिन्न दिशाओं से डॉकिंग करने योग्य बना दिया है।
चीन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के द्वार भी खोल दिए हैं। स्विट्जरलैंड, पोलैंड, जर्मनी और इटली समेत कम से कम 17 देशों के वैज्ञानिक प्रयोग थ्येनकोंग पर पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं। चीन और रूस मिलकर अंतरराष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन परियोजना पर काम कर रहे हैं। यूरोप के साथ SMILE उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया है। लैटिन अमेरिका में ब्राज़ील, बोलीविया, वेनेज़ुएला और अर्जेंटीना के साथ भी चीन के अंतरिक्ष सहयोग समझौते हैं। हाल ही में दो पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्रियों को थ्येनकोंग स्टेशन पर प्रशिक्षण के लिए चुना गया है। यह पहली बार होगा, जब कोई विदेशी अंतरिक्ष यात्री चीनी अंतरिक्ष स्टेशन पर सवार होगा।
इस पृष्ठभूमि में भारत के लिए चीन के साथ अंतरिक्ष सहयोग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। दोनों देश बड़ी आबादी, विकासशील अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में बढ़ती रुचि जैसे कई मामलों में समानताएं रखते हैं। भारत का इसरो (ISRO) चंद्रयान, मंगलयान और निजी उपग्रह प्रक्षेपणों में सफलता हासिल कर चुका है, जबकि चीन के पास मानव अंतरिक्ष उड़ान, डॉकिंग तकनीक और दीर्घकालिक अंतरिक्ष स्टेशन संचालन का व्यापक अनुभव है। दोनों देश मिलकर कई क्षेत्रों में सहयोग कर सकते हैं, जैसे वैज्ञानिक प्रयोग, चंद्र और गहन अंतरिक्ष मिशन, आपदा प्रबंधन, पृथ्वी अवलोकन, लेज़र डॉकिंग और रेंडेज़वस तकनीक, तथा अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण। बेशक, राजनीतिक मतभेद और सीमा विवाद इस सहयोग में बाधा बन सकते हैं। लेकिन अंतरिक्ष वह क्षेत्र है, जहां देश साझा मानवीय लक्ष्यों के लिए एकजुट होते हैं। जैसा कि चीनी अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी को अंतरिक्ष से देखते हुए कहते हैं, वहां कोई सीमाएं दिखाई नहीं देतीं, केवल एक नीला ग्रह दिखाई देता है। यही “शांत प्रेम” चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहा है।
भारत को अब इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग से न केवल दोनों देशों के नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, बल्कि इससे एशिया अंतरिक्ष क्षेत्र में एक मजबूत और एकजुट शक्ति के रूप में उभर सकता है। सच तो यह है कि अगर दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देश इस क्षेत्र में साथ आ जाएं, तो मानवता की सितारों तक पहुंच और तेज़ हो सकती है।
(लेखक—रमेश शर्मा)
मेष: दिन शुभ रहेगा...