Last Updated: September 23, 2026

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CGTN सर्वेक्षण: जापान की नई खुफिया व्यवस्था को लेकर वैश्विक स्तर पर बढ़ी चिंता

May 29, 2026

CGTN सर्वेक्षण: जापान की नई खुफिया व्यवस्था को लेकर वैश्विक स्तर पर बढ़ी चिंता

खुफिया संस्थाओं का केंद्रीकरण इतिहास में अक्सर सैन्य विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया है। ऐसे में जापान में राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी की स्थापना की योजना को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं बढ़ रही हैं। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि दक्षिणपंथी ताकतों के समर्थन से प्रस्तावित यह कदम जापान को विदेशी हस्तक्षेप और सैन्य विस्तार की राह पर आगे बढ़ा सकता है।

चाइना मीडिया ग्रुप (CMG) के अधीन आने वाले चाइना ग्लोबल टेलीविज़न नेटवर्क (CGTN) द्वारा किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण में 84.8 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि जापान के दक्षिणपंथी समूहों द्वारा खुफिया तंत्र को मजबूत करने का प्रयास नव-सैन्यवाद की दिशा में एक खतरनाक कदम है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सतर्क निगाह रखनी चाहिए।

जापानी संसद ने बुधवार को एक कानून पारित किया, जिसके तहत राष्ट्रीय खुफिया परिषद के नेतृत्व में एक नई खुफिया प्रणाली स्थापित की जाएगी। प्रस्तावित राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी इसकी परिचालन शाखा के रूप में कार्य करेगी और देश की विभिन्न खुफिया इकाइयों को एकीकृत कमान के अधीन लाएगी। माना जा रहा है कि यह कदम द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित जापान की विकेंद्रीकृत खुफिया संरचना में बड़ा बदलाव लाएगा तथा खुफिया शक्तियों को प्रधानमंत्री के कार्यालय के अधिक निकट केंद्रित करेगा।

सर्वेक्षण में 86.5 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इसे जापान की युद्धोत्तर खुफिया व्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन बताया। वहीं, 77.7 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इससे सत्ता के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ सकता है तथा नियंत्रण, संतुलन और निगरानी की व्यवस्थाएं कमजोर पड़ सकती हैं।

इस प्रस्तावित कानून ने कई लोगों को जापान की कुख्यात “टोको” व्यवस्था की याद दिलाई है। “टोको”, अर्थात स्पेशल हायर पुलिस, द्वितीय विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान सक्रिय एक गुप्त पुलिस तंत्र था, जिसका उपयोग असहमति को दबाने और वैचारिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जाता था। यह जापानी सैन्यवादियों के लिए घरेलू जनमत को प्रभावित करने का एक प्रमुख साधन माना जाता था।

सर्वेक्षण के अनुसार, 80.8 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने आशंका जताई कि नई व्यवस्था नागरिक स्वतंत्रताओं को कमजोर कर सकती है और जापान को युद्धकालीन सामाजिक नियंत्रण जैसी स्थिति की ओर ले जा सकती है। इसके अलावा, 73.6 प्रतिशत लोगों को चिंता है कि इस एजेंसी का उपयोग युद्ध-विरोधी और शांति समर्थक समूहों को दबाने के लिए किया जा सकता है।

प्रस्तावित राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी विदेशी खुफिया, जासूसी-रोधी गतिविधियों और साइबर खुफिया अभियानों की निगरानी करेगी। विश्लेषकों का मानना है कि इससे अमेरिका के नेतृत्व वाले इंडो-पैसिफिक खुफिया नेटवर्क के साथ जापान का एकीकरण और मजबूत होगा, जिससे क्षेत्रीय मामलों में उसकी भूमिका और प्रभाव बढ़ सकता है।

सर्वेक्षण में 83 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि यह कदम क्षेत्रीय खुफिया प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के बीच पहले से मौजूद नाजुक सुरक्षा विश्वास को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं, 83.2 प्रतिशत लोगों का मानना है कि जापान की यह नई पहल पूर्वी एशिया की सुरक्षा स्थिति को और अस्थिर कर सकती है।

कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी की स्थापना जापान में नव-सैन्यवाद के संस्थागत रूप लेने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। उनके अनुसार, यह कदम जापान के शांतिवादी संविधान की भावना से दूर जाने तथा एक प्रमुख सैन्य शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को पुनर्स्थापित करने के प्रयास का हिस्सा है। सर्वेक्षण में शामिल 87.6 प्रतिशत प्रतिभागियों ने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया।

CGTN के अनुसार, यह सर्वेक्षण उसके विभिन्न मंचों पर अंग्रेज़ी, स्पेनिश, फ़्रांसीसी, अरबी और रूसी भाषाओं में आयोजित किया गया। इसमें 24 घंटों के भीतर 3,028 प्रतिभागियों ने अपने मत दर्ज किए और अपनी टिप्पणियां साझा कीं।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) 

 

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