“एक बार मैं चीन देश गया था,
जिनसे मैं कभी मिला नहीं था,
उन्होंने अपनत्व से मेरा माथा चूमकर
मुझे अपना बना लिया।”
“कविगुरु” रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ये पंक्तियाँ “मेरे जन्मदिन पर” शीर्षक से 21 फरवरी, 1941 को लिखी थीं, अपनी मृत्यु से महज़ कुछ महीने पहले। इन चार पंक्तियों में चीन के प्रति उनका जो स्नेह झलकता है, वह आज भी दोनों देशों के रिश्तों की आत्मा को छू जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार हर साल 7 मई को टैगोर की जयंती मनाई जाती है। 2026 में यह उनकी 165वीं जयंती है। वहीं पूर्वी भारतीय राज्यों पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और पड़ोसी देश बांग्लादेश में पारंपरिक बंगाली चंद्र-सौर कैलेंडर के अनुसार ‘बोइशाख’ महीने की 25 तारीख़, यानी 9 मई को, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। तारीख़ दो हों, पर भाव एक ही है गुरुदेव अमर हैं।
भारतीय साहित्य के दिग्गज और एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता टैगोर केवल भारत की धरोहर नहीं, चीन के दिलों में भी बसे हैं। उनकी कविताओं ने भाषा की दीवारें तोड़ीं और मित्रता का सेतु बनाया। चीनी पाठक आज भी उन्हें उतने ही प्रेम से पढ़ते हैं जितना कभी बीजिंग में उनका स्वागत हुआ था। चीन उन्हें सिर्फ कवि नहीं, एक दार्शनिक और सभ्यताओं के बीच संवाद-सेतु के रूप में याद करता है। टैगोर की रचनाएँ चीनी भाषा में व्यापक रूप से अनूदित हुई हैं। एक कवि के रूप में, उन्होंने पिछली शताब्दी के शुरुआती दशकों में चीनी बुद्धिजीवियों को गहराई से प्रेरित किया और आज भी चीन में स्वतंत्रता, प्रगति और सृजन के जीवंत प्रतीक हैं- एक ऐसी आवाज़ जो दो प्राचीन सभ्यताओं को आज भी जोड़ती है।
चीन-भारत मैत्री के इतिहास में मील का पत्थर: टैगोर की चीन यात्रा
चीनी विद्वान, पत्रकार, दार्शनिक और ‘चाइनीज़ लेक्चर एसोसिएशन‘ (Jiangxue She) के निदेशक श्री लिआंग छिछाओ (Mr.Liang Qichao) के निमंत्रण पर रवीन्द्रनाथ टैगोर 1924 में चीन गए थे। भारतीय कवि की वह सनसनीखेज यात्रा आज भी चीनी जनता के हृदय में संजोई हुई है। यह केवल एक यात्रा नहीं, चीन-भारत संबंधों के इतिहास में एक युग-प्रवर्तक घटना थी। शांगहाई ,हांगचओ, नानचिंग, पेइचिंग समेत कई शहरों में उन्होंने उस दौर के साहित्यिक और कलात्मक जगत की विभूतियों से आत्मीय संवाद किया। टैगोर की इस यात्रा ने सदियों की औपनिवेशिक जड़ता से जकड़े दो महान राष्ट्रों के देशभक्तों और बुद्धिजीवियों को जगाया, उन्हें एक साझी चेतना से जोड़ा। चीनी विद्वानों ने इसे तब “धरती को हिला देने वाली घटना” (earth-shaking event) कहा था और सही कहा था।
12 अप्रैल, 1924 को चीन की धरती पर पहला कदम रखते ही गुरुदेव टैगोर भाव-विभोर हो उठे। उनके मुख से निकले ये शब्द आज भी हृदय छू लेते हैं: “मैं नहीं जानता क्यों, पर चीन आना मुझे अपनी मातृभूमि लौटने जैसा लगता है। मुझे सदा लगता है कि भारत चीन का अत्यंत निकट संबंधी रहा है, और चीन-भारत ने युगों से स्नेहपूर्ण भाईचारा निभाया है।” चीन ने नोबेल पुरस्कार विजेता कविगुरु पर सचमुच जादू कर दिया था। अपने व्याख्यानों में वे चीन के “सौंदर्य-लोक”, उसकी “प्रज्ञा” और “मानवीय स्पर्श” पर भाव-विभोर होकर बोले। ग़ौरतलब है कि 1924 में रवीन्द्रनाथ टैगोर की पेइचिंग -यात्रा के दौरान प्रसिद्ध चीनी वास्तुकार व लेखिका लिन हुई-इन (Lin Huiyin )और चीनी कवि श्यू चीमो ( Xu Zhimo) ने उनके दुभाषिए के रूप में सेवा दी थी। यात्रा के दौरान चीनी मित्रों ने उनका 64वाँ जन्मदिन मनाया और उन्हें “चु चेनतान” (Zhu Zhendan)नाम दिया — यह नाम दोनों सभ्यताओं के सांस्कृतिक संगम और अटूट मैत्री का प्रतीक बन गया, जिसे टैगोर ने जीवनभर संजोकर रखा।
चीन में टैगोर के अनेक सार्वजनिक व्याख्यानों ने वहाँ के सांस्कृतिक और बौद्धिक जगत को गहराई से प्रभावित किया। उनकी रचनाओं में मानवता और शांति का आह्वान तो है ही, साथ ही पाश्चात्य आधुनिक सभ्यता की निर्मम समीक्षा भी है। ये दर्शन गुओ मोरुओ (Guo Moruo), श्यू चीमो ( Xu Zhimo) और शी पिन शिन (Xie Bingxin), लियू पान-नोंग(Liu Bannong), चेंग चेनतुओ (Zheng Zhenduo) जैसे चीनी साहित्यकारों की लेखनी में उतरे, और आज के विश्व में इनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।
एक भारतीय लेखक और चिंतक के रूप में टैगोर की रचनाएँ 1915 में ही चीन पहुँच गई थीं, और निस्संदेह उन्होंने आधुनिक चीनी साहित्य के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी लोकप्रियता का प्रमाण 2009 में ‘ग्लोबल टाइम्स’ के सर्वेक्षण से मिलता है, जहाँ वे “60 सर्वाधिक प्रभावशाली विदेशियों” की सूची में 11वें स्थान पर थे किसी भी भारतीय के लिए गर्व का क्षण। चीन प्रवास में टैगोर ने भारत-चीन के पारंपरिक मैत्रीपूर्ण संबंधों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की मुक्त कंठ से सराहना की। वे दोनों देशों के पारस्परिक लाभकारी, संवादधर्मी रिश्ते में विश्वास करते थे और सदियों से धुंधली पड़ चुकी उस राह को फिर से खोलने के प्रबल पक्षधर थे। टैगोर का वह सपना धीरे-धीरे साकार हो रहा है।
मैत्री के सेतु-निर्माता के रूप में चीन की स्मृति में अमर हैं टैगोर:
रवीन्द्रनाथ टैगोर चीन में केवल एक कवि नहीं, मैत्री के सेतु-निर्माता के रूप में पूजे जाते हैं। आधुनिक युग में भी चीनी नेतृत्व टैगोर के मानवतावाद और आदर्शों को विशेष महत्व देता है। जून 1954 में भारत यात्रा के दौरान चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई ने साफ़ कहा था, “हम टैगोर के चीन-प्रेम को कभी नहीं भूलेंगे, और न ही चीन के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन को दिए उनके समर्थन को भुला सकते हैं।” सितंबर 2014 में भारत आए चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने बताया कि उन्होंने साहित्य के नोबेल विजेता की कई कविता-संग्रह पढ़े हैं। उन्होंने टैगोर को उद्धृत किया: “ग्रीष्म के फूल-सा भव्य होकर खिलो; शरद के पत्ते-सा शांत और सुंदर होकर झरो!” (“Grow like a summer flower, magnificently; die like an autumn leaf, quietly and beautifully!”) एक राष्ट्राध्यक्ष के मुँह से गुरुदेव की पंक्तियाँ सुनना बताता है कि टैगोर चीन के मानस में कितने गहरे धँसे हैं।
12 अप्रैल, 1924 को चीन में टैगोर के आगमन के सौ वर्ष बाद भी, चीनी जनता के बीच उनकी लोकप्रियता ज़रा भी कम नहीं हुई है। 12 अप्रैल 2024 को शेन्ज़ेन विश्वविद्यालय (Shenzhen University ) में उनकी ऐतिहासिक यात्रा की शताब्दी पर विशेष संगोष्ठी आयोजित हुई। चीन के दो शीर्ष शैक्षणिक संस्थान पेकिंग विश्वविद्यालय (Peking University ) और सिंघुआ विश्वविद्यालय (Tsinghua University) ने भी टैगोर की चीन-यात्रा के 100 वर्ष पूरे होने पर विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया। यह सम्मान महज़ औपचारिकता नहीं, बल्कि चीन के हृदय से उपजी आत्मीय श्रद्धा है।
इसी कड़ी में 1-2 अप्रैल, 2025 को कोलकाता में चीनी महावाणिज्य दूत शू वेई (Xu Wei) और विश्वभारती विश्वविद्यालय ने संयुक्त रूप से शांतिनिकेतन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। यह सम्मेलन 1924 की उस युग-प्रवर्तक चीन-यात्रा की शताब्दी को समर्पित था, जिसने भारत और चीन जैसी दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच मैत्री का अटूट सेतु रचा था। ये स्मृति-आयोजन केवल हमारे पूर्वजों द्वारा सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अर्जित उपलब्धियों का स्मरण नहीं कराते, बल्कि विश्व-भर के देशों के साथ संवाद और सहयोग को और प्रगाढ़ करने की प्रेरणा भी देते हैं।
चीन का अमर मित्र टैगोर: जापानी साम्राज्यवाद के विरुद्ध रणघोष
रवीन्द्रनाथ टैगोर केवल भारत के गौरव नहीं थे, वे चीन की चेतना के भी अभिन्न हिस्से थे। चीन के लिए वे ‘अतिथि’ नहीं, ‘अपने’ थे एक ऐसा अमर मित्र जिसने प्रेम और भाईचारे का संदेश लेकर चीन की धरती पर कदम रखा था। उनके लिए यही भारत-चीन संबंधों की आत्मा थी। एक सदी पहले, जब भारत और चीन दोनों साम्राज्यवादी बेड़ियों और विदेशी आक्रमण के रक्तरंजित दौर से गुज़र रहे थे, टैगोर ने तटस्थ रहना अस्वीकार कर दिया। जुलाई 1937 में जब जापानी साम्राज्यवाद ने चीन पर सर्वग्रासी युद्ध थोप दिया, तब युद्ध की विभीषिका और निराशा के अंधकार को देखकर कविगुरु का संवेदनशील हृदय काँप उठा। पर वे केवल दुखी नहीं हुए उन्होंने कलम उठाई।
उन्होंने अपनी कविताओं और लेखों से जापानी साम्राज्यवाद की बर्बरता के विरुद्ध रणघोष किया। वे चीन के साथ चट्टान की तरह खड़े हुए। उन्हें चीन की जीत पर रत्ती भर भी संदेह नहीं था। उनका उद्घोष आज भी गूँजता है: “चीन अजेय है, उसकी सभ्यता में अनंत संभावनाएँ हैं, और उसके लोग देश के प्रति निःशर्त निष्ठा व अभूतपूर्व एकता से अपने देश के लिए एक नया युग रच रहे हैं।” (“China is unconquerable, her civilization has endless potential, and her people, with their unconditional loyalty to the country and unprecedented unity, are creating a new century for that country.”)
आज जब जापानी वर्तमान प्रधान मंत्री साने ताकाइची (Takaichi Sanae) ताइवान में सैन्य हस्तक्षेप की बात करते हैं, तो यह केवल बयान नहीं, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा की पुनरावृत्ति है। यह युद्धोत्तर विश्व-व्यवस्था को ललकारना है, संयुक्त राष्ट्र चार्टर को रौंदना है, और ताइवान जलडमरूमध्य की शांति में आग लगाना है। चीनी जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। और इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि कविगुरु आज जीवित होते, तो उनकी कलम फिर गरज उठती। जो टैगोर 1937 में जापानी आक्रमण के विरुद्ध खड़े हुए थे, वे आज भी शांति, संप्रभुता और न्याय के पक्ष में ही खड़े होते। क्योंकि टैगोर का मानवतावाद किसी काल-खंड का बंदी नहीं था, वह शाश्वत था।
टैगोर का सपना, दो सभ्यताओं का संगम:
1924 की चीन-यात्रा से टैगोर ने आधुनिक युग में भारत-चीन के बीच समझ और मैत्री के बीज बो दिए थे। पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय में ‘चीना भवन’ चीनी भाषा और संस्कृति विभाग की स्थापना करके उन्होंने दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच बौद्धिक संवाद और विमर्श की ठोस नींव रख दी। उनका विश्वास अटल था: भारत और चीन के लोगों को कंधे-से-कंधा मिलाकर चलना चाहिए, क्योंकि इसमें दोनों का कल्याण है।
इसमें कोई दो-राय नहीं कि इस महान भारतीय कवि का जीवन और लेखन दोनों देशों की जनता को, ख़ासकर युवाओं को, भारत-चीन मैत्री के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देता रहेगा। और इसी समर्पण से वह दिन दूर नहीं जब दोनों राष्ट्र टैगोर के देखे हुए उस सपने को साकार करेंगे जहाँ दिल दिल से मिलेंगे, और मन मन से जुड़ेंगे। क्योंकि टैगोर ने केवल पुल नहीं बनाए थे, उन्होंने भविष्य की राह दिखाई थी।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक— रविशंकर बसु)

