दुनिया आज ऐसे उतार–चढ़ाव से गुजर रही है, जो पिछले कई दशकों में देखने को नहीं मिले। पुरानी एकध्रुवीय व्यवस्था ढह रही है और पश्चिमी देशों की वह ताकत, जो अपने आपको हकदार मानकर दुहरी नीति चलाती थी, अब कमजोर पड़ती दिख रही है। सालों तक इस व्यवस्था को बचाए रखने के लिए युद्ध होते रहे, संस्थाएँ टूटती रहीं और संसाधन बर्बाद होते गए। अब वक्त है कि हम एक नए वैश्विक ढांचे के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं, जहां हर देश का हित मायने रखे और अंतरराष्ट्रीय कानून ही असली आधार बने।
चीन इस नए अंतरराष्ट्रीय संबंध मॉडल का एक अहम उदाहरण बनकर उभरा है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी नीतियों को ढालने में झिझकता नहीं। चीन की सुधार और खुलापन नीति इसका सबसे साफ प्रमाण है। 70 और 80 के दशक में, जब चीन ने अपने सुधार शुरू किए, दुनिया के कई देशों ने उसी रास्ते पर चलने की कोशिश की। सबका लक्ष्य एक ही था- उत्पादन बढ़ाना, उद्योगों को आधुनिक बनाना, असमानताओं को दूर करना, दुनिया से जुड़ना और निवेश आकर्षित करना। लक्ष्य एक जैसे थे, लेकिन लंबी दौड़ में चीन ही वह देश निकला जिसने लगातार कई सालों तक दो-अंकीय वृद्धि बनाए रखी।
चीन की सफलता की वजह यह थी कि उसने किसी और देश की नकल नहीं की। उसने दुनिया के तरीकों को अपने हालात और अपनी ज़रूरतों के मुताबिक ढाला। यही बात हर देश को समझनी होगी कि विकास का असली रास्ता अपने हालात को पहचानकर उनसे मेल खाते फैसले लेने में है। चीन की तरक्की के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी और जनता मिलकर ‘चीनी सपना’ पूरा करने में जुटी है। 20वीं पार्टी कांग्रेस में साफ कहा गया कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण पार्टी का मूल उद्देश्य है और जनता की सेवा उसका पहला कर्तव्य। चीन की शासन व्यवस्था मार्क्सवाद के उस रूप पर आधारित है जिसे चीन ने अपनी संस्कृति और परिस्थितियों के अनुसार ढाल लिया है। इसी मेल ने चीन को स्थिरता और विकास की ताकत दी है।
दुनिया यह भी देखती है कि चीन में समस्याएं हल करने में जनता खुद को शामिल महसूस करती है। यही वजह है कि चीन के मॉडल पर इतना ध्यान दिया जा रहा है। कई देश चाहते हैं कि विकास का ऐसा रास्ता मिले जहां बराबरी हो, घर में भी और दुनिया में भी। चीन की घरेलू स्थिरता भी उसकी मजबूती का बड़ा कारण है। पश्चिमी देशों ने कई बार चीन के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की, लेकिन चीन ने अपने रास्ते को खुद तय किया और सुधारों के जरिए अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को मजबूत किया। इसी का नतीजा है- “एक देश, दो प्रणाली”, “हॉंगकांग पर हॉंगकांग के लोगों का शासन” और “देशभक्त शासन करें” जैसे कदम, जो आज नतीजे देते दिख रहे हैं।
एक और जरूरी बात यह है कि विकास के लिए दुनिया को शीतयुद्ध की सोच से निकलना होगा। पश्चिमी देश अकसर अपने से बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों को प्रतिद्वंद्वी मान लेते हैं। नतीजा यह होता है कि आर्थिक रिश्ते कमजोर होते हैं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान रुकता है, विज्ञान की साझेदारी प्रभावित होती है और आम लोगों की जिंदगी में बेचैनी बढ़ती है। गुटबाजी से टकराव ही बढ़ता है। दुनिया को जिसकी जरूरत है, वह है स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और रचनात्मक सहयोग और चीन इसी सिद्धांत पर चलता दिखाई देता है। वह देशों को राजनीतिक व्यवस्था या इतिहास के आधार पर खेमों में नहीं बाँटता, बल्कि चुनौतियों से मिलकर निपटने की बात करता है। आखिर में, आधुनिक चीन को समझने के लिए एक बात अच्छी तरह समझनी होगी कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी खुद को जनता के प्रति जवाबदेह मानती है। 20वीं पार्टी कांग्रेस में राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कहा था, “देश उसका है, जो उसमें रहता है।” पार्टी का लक्ष्य यही है कि जनता का भरोसा जीतकर उसकी उम्मीदों पर खरी उतरे।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, बीजिंग)

