1 जुलाई, 2026 को छिंगहाई-शीत्सांग रेलवे के पूर्ण संचालन के 20 साल पूरे हो रहे हैं। साल 2006 में शुरू हुई यह रेलवे दुनिया की सबसे ऊंचाई पर चलने वाली रेल लाइनों में गिनी जाती है। लेकिन इसकी पहचान सिर्फ ऊंचाई तक सीमित नहीं है। पिछले दो दशकों में यह रेलवे इंजीनियरिंग कौशल, क्षेत्रीय विकास और लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने की ताकत का प्रतीक बन गई है। यही वजह है कि आज इसे केवल एक रेल लाइन नहीं, बल्कि बदलाव की मिसाल माना जाता है।
अगर इसके सफर पर नजर डालें, तो इसकी कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। करीब 1,956 किलोमीटर लंबी यह रेलवे छिंगहाई प्रांत की राजधानी शीनिंग को शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश की राजधानी ल्हासा से जोड़ती है। दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक इलाकों में बनी इस रेल लाइन ने यात्रा, व्यापार और पर्यटन की तस्वीर पूरी तरह बदल दी। शीनिंग से गोलमुड तक रेल मार्ग पहले से मौजूद था, लेकिन असली चुनौती गोलमुड से ल्हासा तक रेलवे बिछाने की थी। साल 2001 में इसका निर्माण शुरू हुआ और पांच साल की कठिन मेहनत के बाद यह सपना आखिरकार हकीकत बन गया। लेकिन सवाल यह है कि इस रेलवे को इंजीनियरिंग का चमत्कार क्यों कहा जाता है? इसका जवाब तब मिलता है, जब हम इसके निर्माण की चुनौतियों को समझते हैं। इंजीनियरों और श्रमिकों को बेहद कम ऑक्सीजन, कड़ाके की ठंड, सालभर जमी रहने वाली जमीन और बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी जैसी मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ा। रेलवे का बड़ा हिस्सा 4,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर है, जबकि इसका सबसे ऊंचा बिंदु करीब 5,072 मीटर तक पहुंचता है। ऐसे माहौल में सिर्फ रेलवे बनाना ही नहीं, बल्कि हर दिन उसका सुरक्षित संचालन और रखरखाव भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
इन्हीं कठिन परिस्थितियों का असर वहां रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी साफ दिखाई देता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मैदानी इलाकों में जो काम एक दिन में पूरा हो जाता है, वही यहां कई दिन ले सकता है। इसके बावजूद इस रेलवे ने केवल दो शहरों को नहीं जोड़ा, बल्कि पूरे क्षेत्र की जिंदगी बदल दी। अब लोगों और सामान की आवाजाही पहले से कहीं ज्यादा तेज, आसान और भरोसेमंद हो गई है। जरूरी सामान समय पर पहुंचने लगा है और परिवहन की लागत भी कम हुई है। यही बदलाव पर्यटन के क्षेत्र में भी साफ नजर आता है। इस रेलवे ने शीत्सांग को दुनिया भर के यात्रियों के और करीब ला दिया है। हर साल चीन और दुनिया के अलग-अलग देशों से लाखों पर्यटक इस अनोखे सफर का अनुभव करने आते हैं। यात्रा के दौरान बर्फ से ढकी पर्वत चोटियां, विशाल घास के मैदान, दलदली क्षेत्र और दूर-दूर तक फैला पठारी इलाका यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देता है। बहुत से लोगों के लिए यह केवल ट्रेन का सफर नहीं, बल्कि जिंदगी भर याद रहने वाला अनुभव बन जाता है।
समय के साथ इस यात्रा को और भी आरामदायक बनाया गया है। हाल के वर्षों में इस मार्ग पर चलने वाली पर्यटक विशेष ट्रेनों में कई आधुनिक सुविधाएं जोड़ी गई हैं। वातानुकूलित (AC) स्लीपर कोच और ऑक्सीजन आपूर्ति प्रणाली जैसी सुविधाएं ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रियों को अधिक आराम और सुरक्षा देती हैं। साल 2024 में शुरू हुई इन विशेष ट्रेनों की खासियत यह है कि वे शाम को रवाना होती हैं और अगली शाम तक लौट आती हैं। इससे यात्री रातभर के सफर के साथ पठारी क्षेत्र का अलग और अनोखा अनुभव भी ले सकते हैं। इन सुविधाओं का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। पहले जहां ऊंचाई और लंबी यात्रा को लेकर कई लोगों को चिंता रहती थी, वहीं अब बुजुर्ग, परिवार और दूर-दराज से आने वाले पर्यटक भी पहले की तुलना में ज्यादा सहजता से इस यात्रा का आनंद ले रहे हैं। रेलवे प्रशासन ने भी संकेत दिए हैं कि भविष्य में यात्रियों की मांग और मौसम को देखते हुए ऐसी सेवाओं का विस्तार दूसरे मार्गों तक किया जा सकता है
आज, पूर्ण संचालन के 20 साल बाद, छिंगहाई-शीत्सांग रेलवे इस बात का मजबूत उदाहरण बन चुकी है कि बेहतर आधारभूत ढांचा किस तरह सबसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को भी विकास के अवसर में बदल सकता है। स्थायी रूप से जमी जमीन, ऊंचे पहाड़, कम ऑक्सीजन और कठोर मौसम के बीच बनी यह रेलवे केवल पटरियों और ट्रेनों की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसने पठारी क्षेत्र में जीवन, संपर्क और विकास को नई रफ्तार दी है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए संभावनाओं के नए रास्ते खोल दिए हैं।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, बीजिंग)
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