Site icon Dainik Savera Times

मानवाधिकार मुद्दों की चर्चा विकास के दृष्टिकोण से की जानी चाहिये

मानवाधिकार हमेशा से एक ऐसा विषय रहा है जिसके बारे में पश्चिमी व्यक्ति बात करते रहे हैं। लेकिन, मानवाधिकार का सार क्या हैं और किस प्रकार के वातावरण में लोगों को किस प्रकार के मानवाधिकार प्राप्त होने चाहिए, इस बारे में अलग-अलग विचार मौजूद हैं। सुधार और खुलेपन के बाद, चीनी अर्थव्यवस्था की लम्बी छलांग लगी है, और आर्थिक विकास के साथ-साथ चीनी लोगों के जीवन की गुणवत्ता में भी काफी सुधार हुआ है। हालाँकि, पश्चिम में कुछ लोग मानवाधिकार के मुद्दों पर चीन की आलोचना करना कभी बंद नहीं करते। उनके लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि जो देश पश्चिमी प्रणालियों को नहीं अपनाता, वह इतनी महान उपलब्धियां हासिल कर सकता है। इसलिए वे मानवाधिकार के विषय का उपयोग केवल अपनी नैतिक श्रेष्ठता की भावना को मजबूत करने के लिए ही कर सकते हैं।

चीन की विकास उपलब्धियों का मूल्यांकन करने में कुछ लोगों ने जानबूझकर “निम्न मानवाधिकार आर्थिक विकास को बढ़ावा देते ” का विचार तैयार किया। दूसरे शब्दों में, चीन ने निम्न मानवाधिकार की कीमत पर आर्थिक विकास हासिल किया है, और “कम मानवाधिकार लाभ” ही चीन की आर्थिक छलांग का कारण है। उनका मानना है कि चीन ने “कम मानवाधिकारों” के माध्यम से अधिक श्रम संसाधन प्राप्त किए हैं, और यहां तक कि यह निष्कर्ष भी निकाला है कि चीन का आर्थिक विकास जितनी तेजी से होगा, मानवाधिकारों की स्थिति उतनी ही खराब होगी। पर वास्तव में, चीन में लोगों के बुनियादी जीवन की पूरी गारंटी है, सार्वजनिक सुरक्षा अच्छी है, समाज स्थिर और शांतिपूर्ण है, और श्रमिक स्वतंत्र रूप से अपनी नौकरी चुन सकते हैं और अपने जीवन आदर्शों को साकार कर सकते हैं। यदि कोई जानबूझकर तथ्यों को नहीं मिटा रहा है, तो उसे यह स्वीकार करना पड़ता है कि चीन की मानवाधिकार स्थिति अधिकांश देशों की तुलना में बेहतर है। कुछ बेतुकी विचारधारा के मुताबिक, पश्चिमी प्रणाली को लागू करने वाले किसी भी देश के मानवाधिकार उच्च हैं, पर इस बात की अनदेखी है कि क्या इन देशों में लोगों की वास्तविक जीवन स्थितियों की गारंटी और सुधार है या नहीं।

मानवाधिकारों में सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण है जीवन का अधिकार, अर्थात लोगों को सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण में पर्याप्त रोजगार, चिकित्सा देखभाल, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य जीवन स्थितियों का अधिकार है। इसके बाद ही राजनीतिक अधिकार है जैसे चुनावों में भाग लेना और राजनीतिक दलों का आयोजन करना आदि। लेकिन, जो लोग पश्चिमी मानवाधिकार सिद्धांतों से ग्रस्त हैं, वे बुनियादी मानव अस्तित्व स्थितियों की परवाह करने के बजाय सिर्फ बहुदलीय प्रणाली और राजनीतिक चुनाव जैसे प्रतीकों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। उनके विचार में, कुछ देश जो अपने लोगों की बुनियादी जीवन स्थितियों की गारंटी देने में असमर्थ हैं, वे “उच्च मानवाधिकार” वाले देश ही होते हैं, जबकि चीन जैसे देश जिसने जबरदस्त विकास परिणाम हासिल किए हैं,  “निम्न मानवाधिकार” वाला देश ही है। लेकिन लोग यह देखते हैं कि पश्चिम की लोकतांत्रिक प्रणाली वाले कुछ तथाकथित उच्च मानवाधिकार वाले देशों में लोग न केवल गरीबी और अशांति से पीड़ित हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी रोजगार, सुरक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी भी नहीं मिलती है। ऐसे मानवाधिकार वहां रहने वाले लोगों के लिए केवल त्रासदी ही हो सकते हैं।

मानवाधिकार मुद्दों की चर्चा सामाजिक विकास के परिप्रेक्ष्य से की जानी चाहिए, और लोकतंत्र और स्वतंत्रता केवल कुछ निश्चित शर्तों के तहत ही प्राप्त की जा सकती है। कुछ देशों में, जहां तथाकथित लोकतांत्रिक प्रणाली लागू है, आर्थिक विकास नहीं किया जा सकता, और वहां के लोग कष्ट में रहते हैं, उनका जीवन और स्वास्थ्य किसी भी समय खतरे में रहता है। ऐसी परिस्थितियों में बहुदलीय लोकतांत्रिक चुनाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में निरर्थक हैं। तीव्र आर्थिक विकास वाले समाज में, आर्थिक उपलब्धियों से अन्य सामाजिक स्थितियों में सुधार लाया जाएगा। आर्थिक विकास जितना तीव्र होगा, भौतिक संपदा उतनी ही समृद्ध होगी, इनके साथ लोगों का जीवन उतना ही सुरक्षित होगा, और मानवाधिकारों पर उतना ही अधिक जोर दिया जा सकेगा। यही है चीन की वर्तमान विकास की वास्तविकता।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)

ये भी पढ़ें- पड़ोसी देश पाकिस्तान में लगे तेज भूकंप के झटके, घरों से बाहर निकल भागे लोग, जानें कितनी रही तीव्रता

Exit mobile version