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साझा आर्थिक हित के लिए साथ आ रहे भारत-चीन

अमेरिकी टैरिफ युद्ध के दौर में भारत और चीन ने समझ लिया है कि साथ मिलकर ही नई वैश्विक चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। इसका नतीजा चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान दिखा। अब चीन ने भारत को दुर्लभ खनिज यानी रेयर अर्थ्स एलिमेंट , उर्वरक और सुरंग खोदने वाली मशीनों की आपूर्ति बहाल करने की बात मान ली है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की बहाली पर भी सहमति बनी है।  दुर्लभ खनिज, उर्वरक और टनल बोरिंग मशीनों की आपूर्ति से जहां भारत को राहत मिलने वाली है, वहीं सीधी उड़ान  सेवा बहाल होने से दोनों देशों के बीच सैलानियों और कारोबारियों की तेज आवाजाही हो सकेगी। 

कुछ समय से चीन की ओर उर्वरकों, विशेषकर डाई अमोनिया फास्फेट की आपूर्ति बंद थी, जिसकी वजह से भारत महंगी कीमत पर दूसरे देशों से इन्हें खरीद रहा था। आपूर्ति रोकते वक्त चीन की ओर से कहा गया था, कि अपनी घरेलू जरुरतों को पूरा करने के लिए ऐसा कदम उठाया जा रहा है। इसी प्रकार दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) की आपूर्ति भी रोकी गई थी। यहां जानना जरूरी है कि दुनियाभर में सबसे ज्यादा दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति चीन ही करता है। जिनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल ऑटो और इलेक्ट्रानिक उद्योग में होता है। सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए इन्हीं खनिजों की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा सुरंग खोदने वाली मशीनों की आपूर्ति भी चीन की तरफ से नहीं हो रही थी। इसके चलते भारत में बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर कार्य कर रही कंपनियां परेशान थीं। वांग यी की यात्रा के दौरान हुई दोनों देशों की बातचीत के बाद अब चीन की तरफ से इनसे जुड़ी लंबित खरीद प्रक्रिया को मंजूरी मिलने लगी है। कुछ मामलों में तो इन चीजों को भारत भेजने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि वैश्विक हालात और आपसी साझेदारी की महत्ता को देखते हुए दोनों देशों ने इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए और इस प्रक्रिया को फिर से बहाल किया है।

यहां बताना जरूरी है कि जिन दुर्लभ खनिजों यानी रेयर अर्थ एलिमेंट की आपूर्ति चीन से होने जा रही है, वे क्या हैं? दरअसल ये  17 विशेष रासायनिक तत्वों का समूह है, जिनमें लैंथिनम, सीरियम, नियोडिमियम, प्रासियोडिमियम, और इट्रियम जैसे तत्व शामिल हैं। ये खनिज दुर्लभ इसलिए हैं, क्योंकि इन्हें पृथ्वी की सतह से निकालना और शुद्ध करना बेहद जटिल और महंगी प्रक्रिया है। इनका उपयोग सभी आधुनिक तकनीक में मसलन, एआइ, जेन एआइ, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष अन्वेषण, स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी और राकेट विज्ञान में किया जाता है। इलेक्ट्रानिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन, विमान इंजन, चिकित्सा उपकरण, तेल शोधन और सैन्य सामग्री बनाने में भी इन खनिजों की जरूरत पड़ती है। इस तरह देखें तो ये तत्व किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अमेरिका की चीन के साथ तनातनी बढ़ा रखी है तो भारत पर उसने कठोर और बड़ा शुल्क थोप दिया है। ऐसे हालात में एशिया की दो महाशक्तियों का साथ आना समय की  जरूरत है। चीन जहां दुनिया की तीसरी बड़ी सैन्य और दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहीं भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत है। ऐसे में दोनों देशों का साथ आना ना सिर्फ वैश्विक संतुलन, बल्कि एशिया की स्थिरता के लिए भी जरूरी है। दोनों देश पड़ोसी भी हैं और कई बिंदुओं एवं मोर्चों पर उनके साझा हित भी हैं। इसलिए दोनों देशों के बीच जमी रिश्तों की बर्फ का इस तरह पिघलना सुखद संकेत  है। इससे जहां दोनों देशों की जनता को फायदा होगा, वहीं दोनों देशों के बीच आपसी आर्थिक रिश्ते मजबूत होंगे। 

 

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)  (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

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