India-China Economic Relations: भारत सरकार ने वर्ष 2025 को आर्थिक सुधारों के आधार स्तंभ के रूप में स्थापित करते हुए अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति में एक दूरगामी बदलाव किया है। विशेष रूप से चीन से आने वाले निवेश को लेकर ‘प्रेस नोट 3’ में किया गया संशोधन इस समय वैश्विक आर्थिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में प्रोफेसर डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह ने चाइना मीडिया ग्रुप के अधीन CGTN हिन्दी के साथ एक ख़ास बातचीत में इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से बताया।
डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह के अनुसार, 10 प्रतिशत से कम हिस्सेदारी वाले चीनी निवेश को ‘ऑटोमेटिक रूट’ से मंजूरी देना एक व्यावहारिक और संतुलित कदम है। वे इसे न तो पूरी तरह से दरवाजा खोलना मानते हैं और न ही पूरी तरह बंद करना, बल्कि इसे एक ‘नियंत्रित प्रवेश’ की संज्ञा देते हैं। पहले हर निवेश प्रस्ताव को कड़ी सरकारी जांच से गुजरना पड़ता था, जिससे प्रक्रिया काफी लंबी और अनिश्चित हो जाती थी, लेकिन अब 60 दिनों की समय सीमा तय करना निवेशकों में भरोसे का संचार करेगा, जो नीतिगत स्पष्टता और प्रशासनिक सुधार का एक बड़ा संकेत है।
डॉ. सिंह का तर्क है कि यह बदलाव भारत की आर्थिक स्वायत्तता को कमजोर करने के बजाय उसे और अधिक मजबूती प्रदान करता है। वे कहते हैं कि भारत अब केवल रक्षात्मक सोच तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘नियंत्रित खुलेपन’ की ओर कदम बढ़ा रहा है। इस नीति का प्राथमिक उद्देश्य केवल विदेशी पूंजी लाना नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता हासिल करना है। भारत सरकार का स्पष्ट विजन है कि पूंजी के साथ-साथ कौशल और क्षमता का हस्तांतरण भी होना चाहिए।
प्रोफेसर डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह के मुताबिक, यदि निवेश के साथ ज्ञान का साझाकरण नहीं होता, तो वह निवेश अधूरा है। 60 दिन की समय सीमा पूंजी और क्षमता के बीच एक पुल की तरह कार्य करेगी, जिससे भारतीय उद्योग न केवल निवेश आकर्षित करेंगे बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भी बन सकेंगे। इस नीति का सर्वाधिक प्रभाव इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी उद्योग, सोलर इंडस्ट्री और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर पड़ेगा, जहां चीन की तकनीकी बढ़त को भारत अपने विकास के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
भारत-चीन आर्थिक संबंधों में व्यापार घाटा एक बड़ी चुनौती रहा है। डीयू प्रोफेसर का मानना है कि केवल आयात पर प्रतिबंध लगाना इसका स्थाई समाधान नहीं है, बल्कि भारतीय निर्यात के लिए चीनी बाजार में जगह बनाना अनिवार्य है। विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल्स, जेनेरिक दवाओं और आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भारत की वैश्विक धाक है, और यदि इन्हें चीन के बड़े बाजार तक पहुंच मिले, तो द्विपक्षीय संबंध अधिक संतुलित हो सकते हैं।
आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में प्रोफेसर सिंह स्पष्ट करते हैं कि आत्मनिर्भरता का अर्थ वैश्विक अलगाव नहीं, बल्कि समझदारी से की गई साझेदारी है। वे इसे एक ‘स्टॉप-गैप’ व्यवस्था के रूप में देखते हैं, जो भारत को भविष्य में स्वयं सक्षम बनाने के लिए आवश्यक तकनीक और अनुभव प्रदान करेगी।
वर्तमान परिदृश्य में भारत ‘डी-कपलिंग’ (पूरी तरह अलग होने) के बजाय ‘डी-रिस्किंग’ (जोखिम कम करने) की राह पर चल रहा है। भारत अब एक ऐसी ‘इंटरडिपेंडेंट इकोनॉमिक मॉडल’ की ओर अग्रसर है, जहां दोनों देश एक-दूसरे पर संतुलित तरीके से निर्भर रहेंगे। ‘चाइना प्लस वन’ मॉडल के तहत भारत खुद को चीन के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित कर रहा है।
प्रोफेसर सिंह के अनुसार, यदि यह नीति सही ढंग से लागू होती है, तो भारत का विशाल बाजार और सस्ती श्रम शक्ति, तकनीक एवं निवेश के साथ मिलकर इसे वैश्विक विनिर्माण का एक बड़ा केंद्र बना देगी। चीन से सीमित निवेश की अनुमति देना भारत की मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, जो सुरक्षा और आर्थिक विकास के बीच सटीक संतुलन साधने की क्षमता को दर्शाती है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

