समुद्र में प्लास्टिक का कचरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर मिनट एक ट्रक जितना कचरा पानी में जा गिरता है। देखें तो लगता है जैसे समस्या इतनी बड़ी है कि इसे ठीक करना मुश्किल है। लेकिन चीन में एक ऐसी पहल हुई है जिसने साबित कर दिया कि अगर सोच बदल जाए, तो रास्ते खुद-ब-खुद निकल आते हैं।
इस मॉडल की खासियत इसका आसान-सा आर्थिक तरीका है। ज़मीन पर प्लास्टिक की एक बोतल तीन रूपये में बिकती है, लेकिन समुद्र से निकली वही बोतल 20 रूपये में खरीदी जाती है। यानी सात गुना ज़्यादा। इस वजह से मछुआरों की आमदनी महीने के 2 हज़ार से ज़्यादा युआन (तकरीबन 22-23 हजार रूपये) बढ़ जाती है। यह तरीका लोगों की जरूरत को पर्यावरण की जरूरत से जोड़ देता है। मछुआरे हर दिन समुद्र में रहते हैं, इसलिए वही इस समस्या को सबसे पहले देखते हैं और अब वही इसे हल करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
मछुआरों पर समुद्री प्रदूषण का असर सबसे ज्यादा पड़ता है। प्लास्टिक की थैलियाँ और बोतलें रास्ता रोकती हैं, जबकि समुद्र में घूमते छोड़े हुए जाल, जिन्हें ‘घोस्ट नेट’ कहा जाता है, नाव के पंखों में फँसकर मोटर को खराब भी कर देते हैं। कई बार मछुआरे घंटों पानी में फँसे रह जाते हैं। यह कार्यक्रम उन्हें मजबूर नहीं, बल्कि समुद्र के रक्षक की जगह देता है। कचरा उठाना अब सिर्फ मेहनत का काम नहीं, बल्कि गर्व का काम बन गया है।
जब मछुआरे समुद्र से ढेरों जाल और प्लास्टिक वापस लाने लगे, तो पता चला कि किसी के पास पुराने मछली पकड़ने वाले जालों को रिसाइकल करने की तकनीक ही नहीं है। यह उद्योग में एक खाली जगह थी। आयोजकों ने इंतजार नहीं किया। उन्होंने खुद फैक्ट्री बनाई और इस कठिन प्लास्टिक को रिसाइकल करने का तरीका विकसित किया। यही असली नवाचार है—जहाँ दूसरों को दीवार दिखे, वहाँ रास्ता ढूंढ लेना।
आज समुद्र से निकला प्लास्टिक बिल्कुल भी बेकार नहीं जाता। साफ करके इसे कपड़े, हेलमेट और चश्मे के फ्रेम तक में बदला जा रहा है। कचरा नई चीज़ों का हिस्सा बनता देख लोगों को सुकून भी मिलता है। जैसे समुद्र कह रहा हो कि अगर हम चाहें, तो उसके घाव भर सकते हैं।
इस पहल ने लोगों की सोच में एक और बदलाव लाया है। समुद्र को अब कचरा फेंकने की जगह नहीं, बल्कि संसाधन मानकर देखा जा रहा है। इसी सोच ने एक और नई तकनीक को जन्म दिया—तैरते हुए सोलर पावर स्टेशन। पानी की सतह, जो कभी कूड़ा डालने की जगह समझी जाती थी, अब बिजली बनाने के काम आ रही है। थाईलैंड जैसे देशों में यह तरीका काफी सफल भी हुआ है। यह बताता है कि पर्यावरण के संकट असल में नई तकनीक और नए विचारों का मौका भी होते हैं।
इस मॉडल से बड़ा सबक यह मिलता है कि समाधान सरकार के आदेशों से नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी से निकलता है। जब समुदाय, कमाई और तकनीक एक साथ जुड़ते हैं, तो नतीजे वाकई बड़े होते हैं। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र ने इस पहल को “अर्थ चैंपियंस” सम्मान दिया है।
समुद्र की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन इस मॉडल ने उम्मीद की एक नई लहर जरूर पैदा की है। यह पहल दिखाती है कि बड़ा बदलाव उन्हीं हाथों से आता है जो हर दिन समुद्र को छूते हैं, और उन्हीं दिमागों से जो कचरे में भी संभावना देख लेते हैं। समस्या बड़ी है, लेकिन इंसान की कोशिश उससे भी बड़ी हो सकती है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप (CGTN हिंदी), बीजिंग)

