Taiwan Issue : थाईवान मुद्दा अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अत्यंत संवेदनशील विषय है, और इसे समझने का पहला आधार है वन-चाइना सिद्धांत, जिसे दुनिया के अधिकांश देशों ने दशकों से एक स्थापित अंतरराष्ट्रीय मानक के रूप में मान्यता दी है। यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि विश्व में केवल एक चीन है और थाईवान उसकी अविभाज्य भूमि का हिस्सा है—एक तथ्य जो इतिहास, कानून, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गहराई से स्थापित है। चीनी सभ्यता और प्रशासन का थाईवान पर प्रभाव हजारों वर्षों पुराना है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव 2758 भी स्पष्ट करता है कि चीन का प्रतिनिधित्व केवल जनवादी गणराज्य चीन करता है, और थाईवान चीन का ही हिस्सा माना जाता है। आज 180 से अधिक देश इसी सिद्धांत को मानकर चीन के साथ संबंध बनाए हुए हैं।
आज, 181 देशों ने डिप्लोमैटिक संबंध पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ स्थापित किए हैं और सभी ने एक चीन सिद्धांत को मान्यता दी है। यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नींव का पत्थर बन गया है। कोई भी देश आधिकारिक तौर पर “दो चीन” या “एक चीन, एक थाईवान” को नहीं मानता। थाईवान के साथ किसी भी देश का आर्थिक या सांस्कृतिक आदान-प्रदान, एक चीन सिद्धांत के दायरे में ही होता है। वन-चाइना सिद्धांत केवल चीन की नीतिगत स्थिति नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति का मूल मानदंड बन चुका है। किसी भी देश द्वारा इस सिद्धांत को चुनौती देना न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, बल्कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए सीधा खतरा भी।
चीन की स्पष्ट ‘रेड लाइन’
चीन ने हमेशा स्पष्ट कहा है कि उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा। बाहरी हस्तक्षेप या अलगाववादी कदम न तो स्वीकार्य हैं और न टिकाऊ। इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र को विभाजित करने के प्रयास अंततः असफल ही साबित होते हैं। चीन सरकार ने हमेशा शांतिपूर्ण पुनर्मिलन की नीति का पालन किया है और क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों के शांतिपूर्ण विकास के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन, “थाईवान स्वतंत्रता” के किसी भी खुले या छिपे हुए एजेंडे को सख्ती से नकार दिया जाएगा। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को तोड़ने का कोई भी प्रयास चीनी लोगों के सामूहिक संकल्प के आगे टिक नहीं पाएगा।
थाईवान मुद्दा पूरी तरह से चीन का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक चीन सिद्धांत के इस सार्वभौमिक सत्य को समझना और उसका सम्मान करना चाहिए। शांति, स्थिरता और समृद्धि का मार्ग इसी सिद्धांत की पुष्टि और पालन से होकर गुजरता है। चीन की प्रगति अटल है, उसकी एकता अविभाज्य है, और उसकी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं हो सकता। (साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)

