
नई दिल्ली: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फिलीपींस के सेबू में आयोजित ‘आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक (एडीएमएम प्लस)’ को संबोधित करते हुए कहा कि भारत एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में विश्वास रखता है जो कि आपसी विश्वास, सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित हो। सहयोगात्मक भावना की यही इच्छाशक्ति ही, हमें शांति और व्यवस्था के समक्ष आ रही चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाएगी।
रक्षा मंत्री ने कहा, “भारत ने हमेशा एशियाई केंद्र की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है। हमने एक ऐसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की परिकल्पना की है, जो खुला हो, समावेशी हो और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर आधारित हो। आसियान के साथ हमारा जो दीर्घकालिक रणनीतिक जुड़ाव है, वह साझा हितों, आपसी सम्मान और व्यावहारिक सहयोग पर आधारित है।”
उन्होंने कहा, “आतंकवादियों के खिलाफ भारत के दृष्टिकोण का एक बड़ा उदाहरण, हमने पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर में दिखाया था, जब हमने बड़ी संख्या में आतंकवादी बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया था। यह राज्य-प्रायोजित आतंक के खिलाफ, भारत के स्पष्ट दृष्टिकोण की भी घोषणा की गई थी। आतंकवाद-निरोध के क्षेत्र में भारत का अनुभव, कक्षा या सैद्धांतिक ज्ञान भर नहीं है बल्कि यह दशकों तक जमीनी स्तर पर सीमा पार सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने का अनुभव हासिल हुआ है। आतंकवादियों के खिलाफ हमारी हर रणनीति, वास्तविक संचालन में परखी हुई है और अपनी सफलता साबित कर दी गई है।”
राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत अपने एडीएमएम-प्लस साझेदारों के साथ, अपनी व्यावहारिक और युद्ध-परीक्षित आतंकवाद विरोधी लड़ाई को साझा करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। संयुक्त सैन्य अभ्यास, क्षमता-निर्माण कार्यक्रम और मजबूत खुफिया जानकारी साझा करने के माध्यम से हम अपनी सामूहिक क्षमताओं को और मजबूत कर सकते हैं। हम एक ऐसे इंडो-पैसिफिक का समर्थन करते हैं, जो सुरक्षित हो, मजबूत हो और जहां केवल शांति और स्थिरता की आकांक्षाएं नहीं बल्कि हमारे सामूहिक प्रयास के परिणाम हों।”
रक्षा मंत्री ने कहा, “भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून को केवल वैध नहीं मानता बल्कि समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी दृढ़ता का पालन भी करता है। नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और वैश्विक समुद्री संचार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रति हमारी वचनबद्धता दशकों के निरंतर अनुभवों पर आधारित है। वर्ष 2008 से ही भारतीय नौसेना ने अदन की खाड़ी जैसे अत्यधिक अस्थिर समुद्री गलियारे में लगातार सक्रिय उपस्थिति बनाए रखी है। इस दौरान भारत ने किसी भी प्रकार के ऐसे बल प्रयोग का सहारा नहीं लिया जो दूसरे देशों के हितों को कमजोर करता हो। अपने अग्रिम पंक्ति के युद्धपोत की तैनाती के माध्यम से भारतीय नौसेना ने हजारों व्यापारी जहाज को सुरक्षा प्रदान की है और समुद्र में जहाजों के अपहरण की अनेक कोशिशों को विफल किया है।”