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भारत-पाक तनाव पर अमेरिकी मध्यस्थता की पेशकश, विदेश मंत्री रुबियो ने पाक सेना प्रमुख से की बातचीत

इंटरनेशनल डेस्क: दक्षिण एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाने का संकेत दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री ‘मार्को रुबियो’ ने शुक्रवार को पाकिस्तानी सेना प्रमुख ‘जनरल असीम मुनीर’ से फोन पर बातचीत की और दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के लिए अमेरिका की मदद की पेशकश की।

अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा जारी बयान में कहा गया कि रुबियो ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने के लिए संवाद के रास्ते तलाशने पर बल दिया और अमेरिका की ओर से ‘रचनात्मक वार्ता को प्रोत्साहित करने” का प्रस्ताव रखा। यह बयान उस समय आया है जब जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में बढ़ती गोलीबारी और ड्रोन हमलों ने हालात को और नाजुक बना दिया है।

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिका इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने पुष्टि की कि न केवल विदेश मंत्री रुबियो, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में उनकी भूमिका में भी वह लगातार इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं।

-सीमा पर तनाव और ड्रोन खतरों से जनजीवन प्रभावित

भारतीय रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 48 घंटों में पाकिस्तान की ओर से की गई गोलाबारी ने जम्मू के ‘राजौरी’ जिले में कई नागरिक घरों को नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा, नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कम से कम 26 स्थानों पर संदिग्ध ड्रोन गतिविधियां दर्ज की गई हैं। इनमें से एक सशस्त्र ड्रोन ने फिरोजपुर जिले में एक नागरिक क्षेत्र को निशाना बनाया, जिसमें एक स्थानीय परिवार का सदस्य घायल हो गया।

भारतीय सशस्त्र बलों ने स्थिति पर कड़ी निगरानी रखी हुई है और ‘काउंटर-ड्रोन सिस्टम’ का उपयोग करते हुए इन खतरों को निष्क्रिय करने की कोशिश की जा रही है। नागरिकों को सतर्क रहने, अनावश्यक आवाजाही से बचने और सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है।

-अमेरिका की भूमिका: समाधान या कूटनीतिक दबाव?

अमेरिका द्वारा उठाया गया यह कदम दोनों देशों के लिए एक ‘कूटनीतिक मोड़’ साबित हो सकता है। भारत की ओर से अभी तक अमेरिकी मध्यस्थता की पेशकश पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि पाकिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का समर्थन किया है।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की इस पहल से क्षेत्र में कुछ हद तक तनाव कम हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए दोनों देशों को ‘सीधे संवाद और विश्वास बहाली के उपायों’ की ओर बढ़ना होगा। क्या भारत और पाकिस्तान अमेरिका की इस मध्यस्थता को स्वीकार करेंगे, यह आने वाले हफ्तों में स्पष्ट होगा। फिलहाल, सीमाओं पर बढ़ते खतरों के बीच एक रचनात्मक संवाद की उम्मीद बनती दिखाई दे रही है।

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