रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने हाल ही में भारत की दो दिवसीय राजकीय यात्रा की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 23वां भारत-रूस शिखर सम्मेलन आयोजित किया। स्थानीय विश्लेषकों के विचार में पुतिन की यात्रा से दोनों देशों ने परंपरागत मित्रता मजबूत की, द्विपक्षीय सहयोग आगे बढ़ाया और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति में एक-दूसरे का रणनीतिक समर्थन प्राप्त किया।
यूक्रेन मुठभेड़ शुरू होने के बाद यह पुतिन की पहली भारत-यात्रा थी। इस दौरान भारतीय पक्ष ने पुतिन का जबरदस्त सत्कार किया। प्रधानमंत्री मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर खुद हवाई अड्डे जाकर पुतिन की अगवानी की और पुतिन को अपनी कार में बैठने का निमंत्रण दिया और उनके सम्मान में एक निजी रात्रिभोज दिया। अगले दिन शिखर सम्मेलन समेत विभिन्न कायक्रमों में मोदी और पुतिन ने कई बार दो देशों के बीच विशेष और विशेषाधिकार संपन्न रणनीतिक साझेदारी आगे बढ़ाने पर जोर दिया। मोदी ने कहा कि पिछले कई दशकों में भारत-रूस संबंध कई अंतरराष्ट्रीय संकटों व कठिनाइयों से गुजर कर कसौटी पर खरे उतरे हैं।
शिखर सम्मेलन के बाद जारी इस यात्रा के परिणामों की सुबची में कुल 16 समझौते व ज्ञापन शामिल हैं, जो प्रवासन, स्वास्थ्य, समुद्री सहयोग, खाद, कस्मट्स व वाणिज्य, वैज्ञानिक सहयोग व मीडिया से जुड़े हैं। इनमें पहला व प्रवर्तनशील समझौता दोनों देशों के बीच एक देश के नागरिकों का दूसरे देश में अस्थाई श्रमिक गतिविधियों के बारे में है। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मीडिया ब्रीफिंग में इस समझौते की चर्चा में कहा कि यह विज्ञान व तकनीक, आईटी, निर्माण आदि क्षेत्रों में भारत के कुशल श्रमिकों के लिए नये रोजगार के अवसर प्रदान करेगा और रूस के श्रमिकों के अभाव तथा भारत के श्रमिकों की प्रचुरता को जोड़ेगा। इसके अलावा इस सूची में चार घोषणाएं भी शामिल हैं, जिनमें प्रमुख वर्ष 2030 तक भारत-रूस आर्थिक सहयोग के रणनीतिक क्षेत्रों के विकास पर प्रोग्राम है। दोनों पक्षों ने दोहराया कि वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 1 खरब अमेरिकी डॉलर तक उन्नत किया जाएगा। वे अपने अपने मुद्रा से भुगतान करने का अनुपात विस्तृत करेंगे और भारत तथा यूरेसिया आर्थिक संघ के बीच मुक्त व्यापार संधि की वार्ता में तेजी लाएंगे।
विश्लेषकों के विचार में पुतिन की यात्रा से भारत ने फिर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और महत्व दिखाया है, इसके साथ अमेरिकी दबाव के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से जवाब दिया है। ध्यान रहे कि इस साल के शुरू में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने वाशिंगटन जाकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की ।द्विपत्रीय संबंधों में आशावाद का माहौल भरा था ।लेकिन व्यापार वार्ता के गतिरोध में पड़ने के बाद अमेरिका ने भारत को कम आंकने और उसे परेशान करने का तरीका अपनाया। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसंट ने सोशल मीडिया पर खुलेआम भारत को शर्मिंदा किया। उन्होंने दावा किया कि भारत अकसर टाल मटोल करता है और वह विश्व में महत्वपूर्ण प्लेयर नहीं है। ट्रंप ने दहाड़ते हुए कहा कि भारत एक डेड अर्थव्यवस्था है।
उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया ,जो मुख्य आर्थिक समुदायों में सर्वाधिक है। अमेरिकी हमलावर रुख और टैरिफ दबाव से भारत को धक्का लगा और राष्ट्रीय स्वाभिमान पर भी ठेस पहुंची। भारत को अमेरिका के प्रति अधिक गहरी समझ आयी। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी कूटनीति में कुछ बदलाव लाने की जरूरत है। इस संदर्भ में देखा जाए तो भारत के लिए पुतिन की यात्रा का खास महत्व था। रूस के लिए पुतिन की भारत-यात्रा यूक्रेन संकेट से पश्चिमी देशों के घेरे को तोड़ने की दिशा में एक अहम कदम थी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना साख और प्रभाव बरकरार रखने की कोशिश भी थी। इस यात्रा से बाहर संकेत भेजा गया है कि रूस-भारत का रणनीतिक आधार जस का तस है।
कुछ मीडिया ने इस पर भी ध्यान दिया कि पुतिन की यात्रा के दौरान तेल व्यापार पर भारतीय पक्ष सतर्क नजर आया। इसके अलावा यात्रा के पहले मीडिया में बहुचर्चित एस-400 एवं एस-500 वायुभेदी मिसाइल व्यवस्था और सु-57 लड़ाकू विमान जैसे मुद्दों के बारे में दोनों पक्षों ने उल्लेख नहीं किया। विश्लेषकों के विचार में पुतिन की यात्रा से जाहिर है कि भारत रूस रणनीतिक साझेदारी में अंतर्राष्ट्रीय दबाव का सामना करते हुए मजबूत लचीलापन दर्शाया गया है, इसके साथ ही दोनों पक्ष वैश्विक ढांचे के परिवर्तन में नये सहयोग मॉडल की खोज कर रहे हैं।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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