Last Updated: October 6, 2026

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Jammu Kashmir: श्रीनगर में इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड रैकेट का भंडाफोड़, 7 आरोपी गिरफ्तार

March 19, 2026

Jammu Kashmir: श्रीनगर में इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड रैकेट का भंडाफोड़, 7 आरोपी गिरफ्तार

जम्मू कश्मीर डेस्क। श्रीनगर में एक बड़े हाईटेक इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। सीआईके-सीआईडी को पहले ही कई भरोसेमंद और तकनीकी इनपुट मिले थे कि कुछ गुप्त कॉल सेंटर धोखाधड़ी वाली ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल हैं। ये कॉल सेंटर विदेशी और स्थानीय लोगों को निशाना बनाकर उन्हें धोखा देने का काम कर रहे थे।

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इस जानकारी के मिलने के बाद सीआईके ने तुरंत एक खास टीम बनाई, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ और फील्ड ऑपरेटिव्स शामिल थे। टीम ने कई जगहों पर निगरानी रखी, डिजिटल इंटेलिजेंस इकट्ठा किया और सब कुछ वेरिफाई किया। काफी मेहनत और जांच के बाद टीम को श्रीनगर के रंगरेथ इंडस्ट्रियल एरिया में एक मुख्य ऑपरेशनल हब का पता चला। इसके बाद टीम ने शहर के अलग-अलग हिस्सों में तेज और समन्वित छापेमारी की। इस छापेमारी के दौरान सात संदिग्धों को पकड़ा गया और बड़ी मात्रा में डिजिटल उपकरण जब्त किए गए। जब्त किए गए सामान में 13 मोबाइल फोन, 9 लैपटॉप, वीओआईपी सिस्टम, सिम कार्ड, नेटवर्किंग डिवाइस और डिजिटल स्टोरेज मीडिया शामिल थे। इनमें से काफी सारे डिजिटल और कम्युनिकेशन उपकरण ऐसे थे जिनसे साफ पता चलता था कि यह एक अत्यंत संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत आपराधिक नेटवर्क था।

शुरुआती जांच में पता चला कि ये आरोपी एक बड़े और अच्छी तरह से तालमेल बिठाए हुए साइबर क्राइम सिंडिकेट का हिस्सा थे, जिसका नेटवर्क जम्मू-कश्मीर से बाहर भी फैला हुआ था। इस नेटवर्क का एक हिस्सा खास तौर पर विदेशी देशों में लोगों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया था। यूएसए, यूके और कनाडा के लोगों को निशाना बनाया जाता था। इसके लिए इंटरनेशनल कम्युनिकेशन मास्किंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता था। साथ ही, पहचान चुराने, मनोवैज्ञानिक हेरफेर और आधुनिक डिजिटल और क्रिप्टोकरेंसी चैनलों के जरिए पैसे की हेराफेरी की जाती थी।

आरोपियों ने वीओआईपी आधारित सिस्टम के जरिए एक गुप्त और बिना रजिस्ट्रेशन वाला कॉल सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया था। इसके जरिए वे इंटरनेशनल वर्चुअल नंबर बनाते, सर्वर रूटिंग और स्पूफिंग तकनीक का इस्तेमाल करके अपनी असली लोकेशन छुपाते थे। अनजान पीड़ितों के सामने खुद को असली सर्विस प्रोवाइडर दिखाकर उन्हें धोखा दिया जाता था। नकली याहू मेल वेबसाइट और गूगल विज्ञापनों का इस्तेमाल करके लोग इस कॉल सेंटर तक पहुंचते थे।

कई देशों में ऑनलाइन फिशिंग और कॉल ऑपरेशन के जरिए लोगों से संपर्क किया जाता था। जैसे ही कोई पीड़ित विज्ञापन पर क्लिक करता, उसकी स्क्रीन पर टोल-फ़्री नंबर दिखाई देता। यह नंबर संदिग्धों द्वारा संचालित होता और भोले-भाले लोगों को उनकी बैंकिंग और निजी जानकारी देने के लिए गुमराह किया जाता। इसके बाद पैसे अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किए जाते, जिनमें म्यूल अकाउंट और क्रिप्टो वॉलेट शामिल थे। पैसे को छिपाने के लिए इन्हें कई बार घुमाया, बदला और ट्रांसफर किया जाता ताकि असली स्रोत का पता न चले।

पीड़ितों को यह यकीन दिलाया जाता कि उनके बैंक या डिवाइस कमप्रोमाइज हो गए हैं और उन्हें तकनीकी सहायता के लिए पैसे देने होंगे। धोखाधड़ी से कमाए गए पैसे फिर डिजिटल वॉलेट, बैंकिंग चैनल और क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिए घुमाए जाते। कई बार इन्हें यूएसडीटी और अन्य क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर ट्रैकिंग मुश्किल बनाई जाती। खास बात यह है कि इस पूरे ऑपरेशन में नकद लेन-देन शामिल नहीं था, जिससे यह पूरी तरह डिजिटल और आधुनिक साइबर फ्रॉड बन गया। अब तक किए गए लेन-देन कई करोड़ रुपये के होने का अनुमान है।

कानून के तहत एफआईआर दर्ज की जा रही है, जिसमें धोखाधड़ी, आपराधिक साज़िश और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराएं शामिल हैं। इसके अलावा, संदिग्धों को पकड़ने के लिए आगे भी छापेमारी की जा रही है। जब्त किए गए उपकरणों का फोरेंसिक विश्लेषण किया जा रहा है। पीड़ितों की पहचान और पैसों के लेन-देन का पता लगाने की कोशिशें जारी हैं। पूरे नेटवर्क की जांच राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जा रही है।

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