नई दिल्ली। अगर आप भी बाजार से अलग-अलग साइज के पाउच में तेल खरीदते हैं तो अपनी ये आदत आज से ही सुधार लें। इस बात के पीछे कोई चेतावनी नहीं, बल्कि सरकार की नई योजना है। अब सरकार इन पाउचों को बंद करने की योजना बना रही है। उसकी योजना है कि वह स्टैंडर्ड पैकेट का नियम लाएगी।
केंद्र सरकार जल्द ही देश के करोड़ों राशन उपभोक्ताओं और आम ग्राहकों के हक में एक बहुत बड़ा फैसला लेने जा रही है। विश्वसनीय रिपोर्ट्स और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक सरकार अब खाद्य तेलों के लिए ‘स्टैंडर्डाइज्ड पैक साइज’ (एक समान तय आकार) लागू करने की तैयारी में है। इस ऐतिहासिक कदम के पीछे सरकार का सीधा मकसद बाजार में पारदर्शिता लाना, कंपनियों की पैकेजिंग वाली चालाकी को रोकना और आम ग्राहकों को धोखे से बचाकर सही कीमत पर सामान उपलब्ध कराना है। बाजार के मौजूदा तौर-तरीकों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि अभी एडिबल ऑयल मार्केट में साइज को लेकर भारी कन्फ्यूजन है।
बाजार में इस समय 1 लीटर के नाम पर 850 मिलीलीटर (ML), 875 मिलीलीटर (ML), 900 मिलीलीटर (ML), 950 मिलीलीटर (ML) जैसे अजीबोगरीब साइज के पैक बेचे जा रहे हैं। आम ग्राहक सुपरमार्केट या किराना दुकान पर जाकर सिर्फ पैकेट के ऊपर लिखी ‘कीमत’ देखता है, उसका ‘साइज’ नहीं। उदाहरण के लिए, एक ब्रांड का 900 ML का पैकेट ₹140 में मिल रहा है और दूसरे ब्रांड का 1 लीटर (1000 ML) का पैकेट ₹150 में है। ऊपरी तौर पर ₹140 वाला पैकेट सस्ता लगता है, लेकिन प्रति लीटर की वास्तविक लागत (Per Litre Real Cost) निकालने पर ग्राहक को नुकसान हो रहा होता है।
अलग-अलग साइज होने के कारण ग्राहक दो ब्रांड्स की कीमतों की सही तुलना नहीं कर पाते। कीमतों की तुलना होगी बेहद आसान: जब सरकार नियम तय कर देगी, तब कंपनियों के बीच पैकेजिंग के साइज को लेकर होने वाला खेल खत्म हो जाएगा। ग्राहक तुरंत समझ जाएंगे कि कौन सा ब्रांड शुद्धता और कीमत के मामले में बेहतर वैल्यू दे रहा है। साइज का अंतर खत्म होने के बाद कंपनियों के बीच मुकाबला इस बात पर नहीं होगा कि कौन कितना कम तेल पैक में भरता है, बल्कि इस बात पर होगा कि किसकी ‘गुणवत्ता’ और ‘शुद्धता’ कितनी बेहतर है। इंडस्ट्री के विनिर्माण विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का एक दूसरा शानदार पहलू भी है, जो पर्यावरण और कॉर्पोरेट दोनों के लिए फायदेमंद है।
अभी कंपनियों को 850ml, 900ml और 1 लीटर के लिए अलग-अलग डिजाइन की बोतलें, अलग कस्टमाइज्ड लेबल और अलग कार्टन बनाने पड़ते हैं। इससे प्रॉडक्शन प्रोसेस जटिल और खर्चीला हो जाता है। साइज एक होने से मैन्युफैक्चरिंग बेहद सरल हो जाएगी। साइज फिक्स होने से पैकेजिंग मटेरियल की बर्बादी रुकेगी। प्लास्टिक का उपयोग सीमित होगा, जिसे सस्टेनेबल (टिकाऊ) और पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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