Last Updated: September 21, 2026

Dainik Savera Times Logo

भारत में सस्ते एचपीवी टेस्ट से सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग को मिल सकती है नई दिशा

June 11, 2026

भारत में सस्ते एचपीवी टेस्ट से सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग को मिल सकती है नई दिशा

सर्वाइकल कैंसर भारत में एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है। हर साल लगभग 1,27,000 नए मामले सामने आते हैं और करीब 80,000 महिलाओं की इस बीमारी से मौत हो जाती है। 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं की नियमित जांच 3–5 साल के अंतराल पर करने से इस बीमारी का जल्दी पता लगाया जा सकता है। इसके लिए ‘विजुअल इंस्पेक्शन विद एसीटिक एसिड’ नामक जांच राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद जांच का दायरा बहुत कम है।

सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का लगातार संक्रमण होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुझाव दिया है कि ह्यूमन पैपिलोमा वायरस टेस्टिंग को अपनाना इस बीमारी को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है। अगर सही ह्यूमन पैपिलोमा वायरस टेस्ट किए जाएं, तो केवल 35 और 45 साल की उम्र में दो बार स्क्रीनिंग पर्याप्त हो सकती है।

ये भी पढ़ें–   https://dainiksaveratimes.com/lifestyle/summer-vacation-travel-temple-tourism/

लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर ह्यूमन पैपिलोमा वायरस टेस्ट महंगे हैं, उन्हें करने के लिए उन्नत तकनीक की जरूरत होती है और ये दूर-दराज के स्वास्थ्य केंद्रों तक आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।

इसी समस्या को हल करने के लिए एक नई रिसर्च में ‘पॉइंट-ऑफ-केयर एचपीवी टेस्ट; विकसित किए गए हैं, जो सस्ते और आसान हैं। इनसे एक ही दिन में जांच और जरूरत पड़ने पर इलाज भी किया जा सकता है। यह तकनीक भारत जैसे देशों के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है।

यह अध्ययन भारत के कई प्रमुख संस्थानों जैसे ईएमएस दिल्ली, आईसीएमआर-एनआइसीपीआर नोएडा, आईसीएमआर-एनआईआरआरसीएच मुंबई और डब्ल्यूएचओ की अंतरराष्ट्रीय एजेंसी आईएआरसी (फ्रांस) के सहयोग से किया गया। इसका उद्देश्य भारत में बने ह्यूमन पैपिलोमा वायरस टेस्ट की गुणवत्ता और उपयोगिता को जांचना था।

अब तक भारत में कई ह्यूमन पैपिलोमा वायरस टेस्ट बनाए गए हैं, लेकिन उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार पूरी तरह परखा नहीं गया था। इस अध्ययन में चार नए पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्ट की जांच की गई, जिनमें से दो को राष्ट्रीय कार्यक्रम में उपयोग के लिए उपयुक्त पाया गया।

एम्स की प्रोफेसर डॉ. नीरजा भाटला ने बताया कि यह पहली बार है जब डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार भारत में बने ह्यूमन पैपिलोमा वायरस टेस्टों का मूल्यांकन किया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे टेस्ट विकसित किए जाने चाहिए जो कम लागत में, कम संसाधनों वाले अस्पतालों में भी आसानी से किए जा सकें।

आईसीएमआर-एनआइसीपीआर की निदेशक डॉ. शालिनी सिंह ने कहा कि 35 और 45 वर्ष की उम्र में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जांच करना डब्ल्यूएचओ की रणनीति का मुख्य हिस्सा है, लेकिन महंगे टेस्ट के कारण इसे बड़े स्तर पर लागू करना मुश्किल है। इसलिए सस्ते और स्थानीय समाधान बहुत जरूरी हैं।

एक अन्य शोधकर्ता डॉ. शोकेट हुसैन ने बताया कि यह नई तकनीक जिला और ब्लॉक स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों में आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है। आने वाले समय में सेल्फ-सैंपलिंग जैसी तकनीक से इसे और भी आसान बनाया जा सकता है।

यह शोध भारत के सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन लक्ष्य को पूरा करने में मदद कर सकता है और अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक अच्छा मॉडल बन सकता है। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस वैक्सीन से नई पीढ़ी को सुरक्षा मिलेगी, लेकिन 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए नियमित ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जांच बहुत जरूरी है।

खबरें और भी हैं...

Copyright © 2025 Dainik Savera Times. All rights reserved.
ऐप खोलें