
आज की भागदौड़ और अनियमित दिनचर्या में खुद को फिट रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे माहौल में फिल्म निर्माता-निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने बताया कि वह अपनी सेहत का कैसे ख्याल रखते हैं और किस तरह की जीवनशैली अपनाते हैं।
एक बातचीत में विवेक रंजन ने कहा कि वह मिनिमलिस्ट लाइफस्टाइल को मानते हैं, जिसे वह वैज्ञानिक भाषा में “सात्विक लाइफ” कहते हैं। उनके मुताबिक सात्विक का मतलब पूजा-पाठ, शाकाहारी या मांसाहारी होना नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध शरीर में सूजन यानी इंफ्लेमेशन न होने से है।
उन्होंने समझाया कि सात्विक भोजन और जीवनशैली वही होती है जो शरीर के लिए सबसे अनुकूल हो। मसालेदार, ज्यादा तेल या मिर्च वाला खाना शरीर में तनाव बढ़ाता है और सूजन की वजह बनता है। यही कारण है कि वह हमेशा सादा और प्राकृतिक भोजन को प्राथमिकता देते हैं।
विवेक रंजन ने बताया कि सात्विकता का असली अर्थ पूरी तरह वैज्ञानिक है। वह प्लांट-बेस्ड फूड लाइफस्टाइल अपनाते हैं, जिसमें फल, सब्जियां, अनाज और दालें शामिल हैं। उनके अनुसार दुनिया के कई बड़े डॉक्टरों और नोबेल पुरस्कार विजेताओं की दशकों पुरानी रिसर्च यह साबित करती है कि प्लांट-बेस्ड डाइट सबसे स्वस्थ होती है। उन्होंने कहा कि जहां ऐसा खाना उपलब्ध नहीं होता, वहां वह व्रत रखना बेहतर समझते हैं और खाना छोड़ देते हैं।
पतंजलि योग के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आसन का मतलब शरीर को सबसे आरामदायक स्थिति में रखना है। यही सिद्धांत वह जीवन में भी अपनाते हैं। उनके मुताबिक, जो चीज या तरीका आपको सबसे ज्यादा सहज महसूस कराए, वही अपनाना चाहिए। वह सिर्फ दो बातों पर चलते हैं सात्विक जीवन और कंफर्टेबल बीइंग। इससे उनकी जरूरतें अपने आप काफी कम हो गई हैं।
इंटरमिटेंट फास्टिंग भी उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा है। विवेक रंजन ने बताया कि यह उनके परिवार की पुरानी आदत रही है रात का खाना जल्दी और सुबह देर तक कुछ न खाना। इससे शरीर को 12 से 16 घंटे का आराम मिल जाता है। वह इसे किसी ट्रेंड की तरह नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से अपनाते हैं, इसलिए नाश्ता नहीं करते।
उन्होंने यह भी कहा कि अच्छी सेहत के लिए मन पर नियंत्रण बेहद जरूरी है। अपने मिनिमलिस्ट सोच के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि अब वह सिर्फ जरूरत की चीजें ही खरीदते हैं, दिखावे या अलमारी भरने के लिए नहीं। हालांकि किताबें उनकी एकमात्र कमजोरी हैं। उनके पास काफी किताबें हैं, जो लोग भेजते हैं या वह खुद खरीदते हैं। अब वह इन्हें दूसरों को बांट रहे हैं और बच्चों की कई किताबें दे भी चुके हैं। उनका कहना है कि जिसे किताबें चाहिए, वह उनसे संपर्क कर सकता है।