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अखिलेश की ओवैसी पर नजर : क्या फिसलेगा मुस्लिम वोट?

Akhilesh's eye on Owaisi: Will the Muslim vote slip?

Akhilesh's eye on Owaisi: Will the Muslim vote slip?

Akhilesh’s and Owaisi, Will Slip Muslim Cote : लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा था। इससे अखिलेश यादव उत्साहित भी हैं।

PDA से के दम पर सपना देखना गलत

अखिलेश सपना देख रहे हैं कि ‘PDA’ यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के नारे के दम पर सत्ता हासिल करेंगे। दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी, मायावती और चंद्रशेखर आजाद भी उत्तर प्रदेश में एक साथ आने की बात कह रहे हैं। इसी को लक्ष्य मानकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने मैदान में पूरी ताकत से उतरने का फैसला किया है। ओवैसी अभी से ही इसकी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। ऐसे में एक सवाल ये भी है कि क्या ओवैसी पश्चिम बंगाल और बिहार के बाद यहां भी गणित बिगाड़ने का काम करेंगे?

इतिहास बता रहा सच

इतिहास इस बात का गवाह है कि बिहार में तेजस्वी यादव के समीकरण और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुस्लिम बहुल गढ़ों में ओवैसी की पार्टी ने सीधे तौर पर वोट बैंक का बंटवारा करके क्षेत्रीय क्षत्रपों को भारी नुकसान पहुंचाया था। अब यही कहानी उत्तर प्रदेश में दोहराए जाने की तैयारी चल रही है। AIMIM ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश यानी रोहिलखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल की उन 100 से अधिक विधानसभा सीटों को चिन्हित किया है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 30% से 50% के बीच है। पार्टी इस बार केवल हवाई जनसभाओं के भरोसे नहीं है। पिछले एक साल से ओवैसी के सिपहसालार यूपी के कस्बों और गांवों में बूथ स्तर पर कमेटियां गठित कर रहे हैं।

ये है ओवैसी का सीधा नैरेटिव

ओवैसी का सीधा नैरेटिव यह है कि मुस्लिम समाज ने एकतरफा वोट देकर अखिलेश यादव की पार्टी को ताकत दी, लेकिन जब मुस्लिम मुद्दों या नेताओं पर संकट आता है तो सपा नेतृत्व कथित तौर पर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के डर से खामोश हो जाता है। उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित को समझने वाले राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मुस्लिम मतों का मामूली सा बिखराव भी पूरे सूबे के नतीजों को पलट कर रख सकता है। यदि एआईएमआईएम मुस्लिम बहुल सीटों पर 10,000 से 25,000 के बीच भी वोट हासिल करने में कामयाब रहती है, तो इसका सीधा असर त्रिकोणीय मुकाबले में बदल जाएगा। मुस्लिम मतों में किसी भी प्रकार का विभाजन सीधे तौर पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए राह को बेहद आसान बना देता है।

क्या कहता है वोट बैंक का गणित

जब विपक्षी खेमे का पारंपरिक वोट बैंक दो या तीन हिस्सों सपा, कांग्रेस, बसपा और एआईएमआईएम में बंटता है, तो भाजपा का कैडर-बेस्ड संगठनात्मक वोट बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सीट निकाल ले जाता है। यदि हम उत्तर प्रदेश के चुनावी भूगोल पर नजर डालें, तो ओवैसी का असर मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में अखिलेश यादव के लिए सिरदर्द बनेगा। पहला, पश्चिमी यूपी में 35% से 45% सीटों पर। खासकर मुरादाबाद, बिजनौर, संभल, रामपुर, अमरोहा में एआईएमआईएम अत्यधिक मुस्लिम समाज सपा का पारंपरिक कोर वोटर है। वहीं, पूर्वांचल 20% से 30% आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, जौनपुर जैसे जिलों में यादव-मुस्लिम गठबंधन बेहद मजबूत स्थिति में रहता है, लेकिन ओवेसी अगर 5 से 10 हजार भी वोट काटती है तो बीजेपी के लिए 2027 का रण आसान हो जाएगा।

अखिलेश के रणनीतिकारों के लिए चुनौती

अखिलेश यादव के रणनीतिकारों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे ओवैसी के इस संभावित खतरे से कैसे निपटें। समाजवादी पार्टी लगातार ओवैसी की पार्टी को भाजपा की ‘बी-टीम’ बताकर प्रचारित करती रही है ताकि मुस्लिम मतदाता भ्रमित न हों। लेकिन, अगर ओवैसी ग्राउंड पर युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल रहे, तो 2027 की चुनावी जंग में अखिलेश यादव के लिए लखनऊ की गद्दी तक पहुंचना उम्मीद से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

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