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खामोशी से ऊंची आवाज छोड़ने का नाम बशीर बद्र, उनका परिचय ही सच्ची श्रद्धांजलि

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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए। जब बशीर बद्र ने ये पंक्तियां लिखी होंगी तो कोई नहीं जानता था कि ये शाम कब होगी। ये पंक्तियां आज स्वयं एक विदाई का सन्नाटा बनकर गूंज रही हैं।

संवेदनशील सितारा हो गया अस्त

उर्दू शायरी का वह नर्म, रोशन और संवेदनशील सितारा अब अस्त हो गया है। केवल एक शायर नहीं गया बल्कि एक पूरी भावनात्मक परंपरा मौन हो गई। 28 मई 2026 को भोपाल में लंबी बीमारी के बाद 91 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी शायरी अब भी सांसों में जीवित है। वे केवल शब्द नहीं रचते थे, बल्कि टूटे हुए दिलों को जोड़ने वाली भावनाओं की पूरी दुनिया बसाते थे—जहाँ दर्द भी सुंदर लगता था और उम्मीद भी बहुत करीब। उनका जाना एक खालीपन नहीं, बल्कि एक ऐसी खामोश मौजूदगी है जो हर एहसास में धीरे-धीरे उतरती रहती है।

साहित्य का आघात है पद्मश्री का जाना

जब शब्दों की रौशनी खुद इतिहास बन जाए, तो समझिए कोई शायर अमर हो चुका होता है। मशहूर उर्दू शायर और गज़लकार पद्मश्री बशीर बद्र का जाना साहित्य जगत के लिए एक ऐसा आघात है जिसने भावनाओं की सबसे नाज़ुक परत को हिला दिया। वे उन विरले शायरों में थे जिनके शब्द मंच से उतरकर सीधे जीवन की सांसों में बस जाते थे। उनका जाना केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि उस आवाज़ का ठहर जाना है जिसने सादगी को भी शिखर बना दिया। फिर भी, उनकी ग़ज़लें आज भी हर टूटे दिल में जीवित हैं और हर याद में चुपचाप रोशनी बनकर चलती रहती हैं।

7 साल की उम्र में शुरू की थी शायरी

जहां शब्द जन्म लेते हैं और संवेदना उन्हें आकार देती है, वहीं से एक असाधारण सफ़र शुरू होता है। 15 फरवरी 1935 को अयोध्या (तब फैजाबाद) में जन्मे बशीर बद्र बचपन से ही शायरी की ओर आकर्षित थे और सात वर्ष की उम्र में ही शेर कहने लगे थे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए, एमए और पीएचडी के बाद उन्होंने वहीं उर्दू के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया, फिर मेरठ कॉलेज में 17 वर्षों तक विभागाध्यक्ष रहे। फारसी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी पर उनकी गहरी पकड़ ने उनकी शायरी को समृद्ध और बहुआयामी बनाया। उनका जीवन ज्ञान और भावना का ऐसा संगम रहा जिसने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी।

1987 के मेरठ दंगों ने भीतर से तोड़ा था

जब जीवन की सबसे गहरी आग इंसान के भीतर उतर जाए, तो शब्द भी राख से जन्म लेते हैं। 1987 के मेरठ दंगों ने बशीर बद्र को भीतर तक तोड़ दिया—उनका घर, यादें और अनमोल अनप्रकाशित रचनाएँ सब कुछ जलकर राख हो गया। इस त्रासदी ने उन्हें लंबे समय तक लेखन से दूर कर दिया, और उनका जीवन गहरे खालीपन में डूब गया। लेकिन भोपाल में डॉ. राहत बद्र के साथ नए सिरे से मिली जीवन-धारा ने उन्हें फिर से शब्दों की ओर लौटा दिया। उसी पीड़ा से निकली उनकी अमर पंक्ति—“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…”—आज भी मानवीय संवेदना की सबसे तीखी और सजीव अभिव्यक्ति मानी जाती है।

सीधी और सरल भाषा को अपनाया

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों

शब्दों को सजाने के बजाय उन्हें जीने की कला बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी पहचान थी। उन्होंने जटिल अलंकारों की जगह जीवन की सीधी, सरल भाषा को अपनाया और उसी में गहराई भर दी। प्रेम, विरह, अकेलापन और सामाजिक यथार्थ उनकी ग़ज़लों में सहजता से उतरते थे। उनकी प्रमुख कृतियां ‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘आस’ और ‘कुल्लियात-ए-बशीर बद्र’ आधुनिक उर्दू साहित्य की अमूल्य धरोहर बन गईं। ‘आस’ के लिए उन्हें 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसी वर्ष पद्म श्री से सम्मान मिला। साथ ही उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी से चार बार, बिहार उर्दू अकादमी से एक बार तथा 1980 में न्यूयॉर्क के ‘पोएट ऑफ द ईयर’ सम्मान ने उनकी वैश्विक पहचान को और मजबूत किया।

समय को मात देती हैं पंक्तियां

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

कुछ पंक्तियाँ समय को भी पीछे छोड़ देती हैं और स्मृतियों में हमेशा के लिए बस जाती हैं—ऐसी ही शायरी बशीर बद्र की पहचान है। उनकी मशहूर पंक्तियाँ “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…” और “दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे…” आज भी लोगों की ज़ुबान पर जीवित हैं, जो रिश्तों और भावनाओं को एक नई दृष्टि देती हैं। उनके 18,000 से अधिक शेर और असंख्य ग़ज़लें फिल्मों, रेडियो और मुशायरों में लगातार गूँजती रही हैं। उनकी शायरी ने उर्दू ग़ज़ल को आम इंसान की भाषा बना दिया, जहाँ हर व्यक्ति अपने दर्द और अपनी पहचान को महसूस कर सकता है।

शब्दों की चमक हमेशा रही अडिग

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

जब यादें साथ छोड़ने लगती हैं, तब भी शब्द अपनी रोशनी नहीं खोते—बशीर बद्र के जीवन का अंतिम चरण इसका साक्षात प्रमाण रहा। डिमेंशिया ने धीरे-धीरे उनकी स्मृतियों पर धुंध छा दी, लेकिन उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र उनकी रचनाएं सुनाकर उन्हें फिर से जीवित करती रहीं। पुत्र नुसरत बद्र के निधन का गहरा आघात भी उन्होंने सहा, जो स्वयं फिल्मी गीतों की दुनिया में प्रतिष्ठित थे। इसके बावजूद, अंतिम वर्षों तक वे मुशायरों के सुल्तान बने रहे, जहाँ उनकी उपस्थिति ही मंच को जीवंत कर देती थी। स्मृतियां भले कमजोर पड़ती रहीं, लेकिन उनके शब्दों की चमक अंत तक अडिग रही—एक ऐसा जीवन, जो संघर्ष, प्रेम और साहित्य की अविस्मरणीय यात्रा बन गया।

विदाई शरीर ने ली, आवाज रहेगी दिलों में

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

विदा तो शरीर ने ली है, पर उनकी आवाज़ अभी भी दिलों में चलती है। बशीर बद्र अब इस संसार में नहीं हैं, फिर भी उनकी शायरी हर उस जगह मौजूद है जहाँ दर्द है, प्रेम है या टूटी हुई उम्मीदों की हल्की सी रोशनी। वे केवल शायर नहीं थे, बल्कि भावनाओं को शब्द देने वाला एक पूरा युग थे। उनकी विरासत बताती है कि साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता, उसे महसूस किया और जिया जाता है। उनकी ग़ज़लें समय की सीमाओं को पार कर आज भी लोगों को जोड़ती हैं, और यही साबित करती हैं कि सच्ची रचना कभी मरती नहीं—वह हमेशा अपने पाठकों के भीतर जीवित रहती है।
-प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

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