
महेंद्रगढ़। पेट्रोल और डीजल के दाम बार-बार बढ़ने से हमारे रहन-सहन में रोजाना परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अब लोग अपने वाहनों का इस्तेमाल सोच समझकर करने लगे हैं। ग्रामीण इलाकों में इसका अलग ही अंदाज नजर आ रहा है। यहां लोग प्रकृति की ओर लौट रहे हैं। ईंधन पर बढ़ते खर्च से परेशान लोग अब आधुनिक साधनों की बजाय पारंपरिक विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसका असर महेंद्रगढ़ और नारनौल के गांवों में साफ दिखाई दे रहा है, जहां कभी सड़कों से गायब हो चुके ऊंट और बैलगाड़ियां फिर से नजर आने लगी हैं। राजस्थान से सटे इस क्षेत्र में छोटे-मोटे कामों और सामान ढोने के लिए ऊंटों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। महंगाई के दौर में ग्रामीणों के लिए यह न केवल किफायती विकल्प साबित हो रहा है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी माना जा रहा है। ऊंटों की घंटियों की गूंज अब गांवों में एक नई कहानी बयां कर रही है—विकास के दौर में फिर से प्रकृति की ओर लौटने की कहानी। करीब दो दशक पहले कृषि क्षेत्र में तेजी से हुए मशीनीकरण के चलते बैलों और ऊंटों की उपयोगिता लगातार कम होती गई थी।
गांवों में ट्रैक्टरों का प्रचलन बढ़ने से बैलगाड़ियां लगभग गायब होने लगी थीं, लेकिन अब डीजल की बढ़ती कीमतों और छोटे होते खेतों ने किसानों की आर्थिक गणित बदल दी है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए ट्रैक्टर खरीदना और उसका खर्च उठाना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में कम खर्चीली बैलगाड़ी और ऊंटगाड़ी फिर से किसानों की जरूरत बनती जा रही हैं। ग्रामीणों के अनुसार एक अच्छी बैलगाड़ी या ऊंटगाड़ी करीब 40 से 60 हजार रुपये में तैयार हो जाती है, जबकि ट्रैक्टर खरीदने और उसके रखरखाव पर लाखों रुपये खर्च होते हैं। बैल और ऊंट सामान्य पशुओं की तरह सूखा-गीला चारा खाकर काम कर लेते हैं, जबकि ट्रैक्टर के लिए रोजाना महंगा डीजल जरूरी है। यही कारण है कि किसान खेतों से चारा लाने, कृषि उपज ढोने और खेत जोतने जैसे कार्यों के लिए फिर पशुधन पर निर्भर होने लगे हैं।
इस बदलाव का सबसे सकारात्मक असर ग्रामीण महिलाओं में देखने को मिल रहा है। गांवों की महिलाएं अब बड़ी संख्या में बैलगाड़ी और ऊंटगाड़ी चलाकर खेतों तक आवागमन कर रही हैं। ग्रामीण महिला सुमित्रा देवी, संतोष और किरण ने बताया कि उनके खेत गांव से काफी दूरी पर हैं और प्रतिदिन चारा लाने तथा कृषि कार्यों के लिए ट्रैक्टर किराये पर लेना काफी महंगा पड़ता था। बैलगाड़ी दोबारा शुरू करने से अब उनका खर्च कम हुआ है और काम भी आसानी से हो रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि पशुचालित गाड़ियां पूरी तरह प्रदूषण मुक्त होती हैं और इनके हल्के वजन से खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी खराब नहीं होती। वहीं, ट्रैक्टरों के भारी टायर खेतों की मिट्टी को कठोर बना देते हैं। महेंद्रगढ़ और सतनाली क्षेत्र के गांवों में अब फिर बैलों के गले में बजते घुंघरुओं और ऊंटगाड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी है। ग्रामीणों का मानना है कि यह बदलाव केवल मजबूरी नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति की वापसी का भी प्रतीक है।
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