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दिल्ली हाईकोर्ट ने 27 साल बाद फ्लैट का आवंटन रद्द करने के डीडीए के फैसले को किया खारिज

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा 1996 में किए गए एक फ्लैट आवंटन को रद्द करने को खारिज कर दिया है और निर्देश दिया है कि फ्लैट को आवंटी के बेटे को सौंप दिया जाए। अदालत ने पाया कि डीडीए द्वारा आवंटन रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, क्योंकि पहले से कोई कारण बताओ या समाप्ति नोटिस नहीं दिया गया था। यह मामला 1996 में किए गए एक आवंटन से जुड़ा था और मूल आवंटी की मृत्यु के बाद, फ्लैट का पंजीकरण उसकी पत्नी और बेटे को स्थानांतरित कर दिया गया था।

बेटे ने फ्लैट पर कब्जा करने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहा। 2016 में डीडीए ने उन्हें सूचित किया कि उनकी फाइल का पता नहीं चल रहा है और आवंटन रद्द कर दिया गया है। अदालत ने कहा कि डीडीए को किराया-खरीद शुल्क का भुगतान मांगने से पहले आवंटी को फ्लैट पर कब्जा देना चाहिए था। इसमें यह भी कहा गया कि डीडीए अपने दायित्व का हिस्सा पूरा किए बिना आवंटन को एकतरफा रद्द नहीं कर सकता। मामले के दौरान पता चला कि आवंटित फ्लैट को 2016 में दोबारा आवंटित कर दिया गया था। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर मूल फ्लैट उपलब्ध नहीं है, तो डीडीए याचिकाकर्ता को वैसा ही फ्लैट आवंटित करे।

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