
नेशनल डेस्क: गुजरात हाई कोर्ट ने दिलीपभाई मंगलाभाई वरली बनाम गुजरात राज्य मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए पति की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस गीता गोपी ने कहा कि पत्नी को बिना बताए मायके में रातभर रुकने पर थप्पड़ मारने की एक अकेली घटना को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत कानूनी क्रूरता नहीं माना जा सकता।
क्या था मामला?
यह मामला मई 1996 का है। वलसाड जिले के सरीगाम पहाड़पाड़ा क्षेत्र में रहने वाली एक महिला ने शादी के करीब एक साल बाद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आरोप था कि पति पत्नी के साथ मारपीट करता था। घटना के दिन पति म्यूजिकल कार्यक्रम से देर रात घर लौटा था। गवाहों के अनुसार, दंपति के बीच अक्सर इस बात को लेकर विवाद होता था कि पति बैंजो बजाने के लिए रात में बाहर जाता और देर से घर लौटता था, जो पत्नी को पसंद नहीं था।
मामले में यह भी सामने आया कि एक बार पत्नी बिना बताए अपने मायके में रुक गई थी। इस बात से नाराज होकर पति ने उसे थप्पड़ मारा था। इसी आधार पर पुलिस ने पति के खिलाफ IPC की धारा 498A (क्रूरता) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया था।
सेशन कोर्ट का फैसला
ट्रायल के बाद 2003 में वलसाड की सेशन कोर्ट ने पति को दोषी ठहराया। अदालत ने धारा 498A के तहत एक साल की सजा और धारा 306 के तहत सात साल की कैद की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी एक घटना को कानूनी क्रूरता नहीं माना जा सकता, जब तक कि लगातार प्रताड़ना या गंभीर उत्पीड़न के ठोस सबूत न हों। रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि महिला ने पति की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या की।
कोर्ट ने दंपति के बीच हुए विवादों को सामान्य वैवाहिक अनबन बताया और कहा कि इसे आपराधिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने पति को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से भी बरी कर दिया और सेशन कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया। इस फैसले के साथ ही करीब 23 साल बाद पति को बड़ी राहत मिली है।
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