Last Updated: October 16, 2026

Dainik Savera Times Logo

2008 अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 38 दोषियों को फांसी और 11 को उम्रकैद की सजा बरकरार

July 7, 2026

2008 अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 38 दोषियों को फांसी और 11 को उम्रकैद की सजा बरकरार

अहमदाबाद: साल 2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में मंगलवार को गुजरात हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए 38 दोषियों को दी गई फांसी की सजा और 11 दोषियों को दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। इसके साथ ही अदालत ने ब्लास्ट में जान गंवाने वाले 56 लोगों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये और 200 से ज्यादा घायल लोगों को 1-1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया है।

26 जुलाई 2008: 49 मिनट में हुए थे 21 धमाके
26 जुलाई 2008 को गुजरात के अहमदाबाद शहर में महज 49 मिनट के भीतर एक के बाद एक 21 बम धमाके हुए थे। इन धमाकों ने पूरे शहर को दहला दिया था। इन विस्फोटों में 56 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। धमाके इतने सुनियोजित तरीके से किए गए थे कि पूरे शहर में अफरा-तफरी मच गई थी।

भीड़भाड़ वाले इलाकों को बनाया गया था निशाना
आतंकियों ने शहर के उन इलाकों को निशाना बनाया, जहां लोगों की सबसे ज्यादा आवाजाही रहती थी।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे

  • नरोदा
  • बापूनगर
  • सरखेज
  • हटकेश्वर

इसके अलावा अस्पतालों, बाजारों, सार्वजनिक स्थानों और शहर की बस सेवा (AMTS) में भी बम लगाए गए थे, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को नुकसान पहुंचाया जा सके।

साइकिलों पर रखे टिफिन बॉक्स में छिपाए गए थे बम
जांच में सामने आया था कि आतंकियों ने बमों को साइकिलों पर रखे टिफिन बॉक्स के अंदर छिपाकर रखा था। यह तरीका 13 मई 2008 को जयपुर में हुए सीरियल ब्लास्ट जैसा ही था। धमाके तय समय पर हुए और कई जगहों पर एक साथ विस्फोट होने से बचाव कार्य भी मुश्किल हो गया।

घायलों को बचाने पहुंचे अस्पताल भी बने निशाना
पहले धमाकों के करीब 40 मिनट बाद आतंकियों ने दो अस्पताल परिसरों में भी बम विस्फोट किए। इन अस्पतालों में शुरुआती धमाकों में घायल लोगों का इलाज चल रहा था। जब एंबुलेंस और लोग घायलों को अस्पताल पहुंचा रहे थे, उसी दौरान वहां भी धमाके कर दिए गए। इस वजह से बचाव कार्य में लगे लोगों और मरीजों की जान भी खतरे में पड़ गई।

2022 में स्पेशल कोर्ट ने सुनाई थी ऐतिहासिक सजा
इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद फरवरी 2022 में स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाया था। अदालत ने 38 आरोपियों को फांसी की सजा और 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि यह मामला “दुर्लभ से भी दुर्लभ” (Rarest of Rare) श्रेणी का है, इसलिए दोषियों को फांसी की सजा देना उचित है। यह देश का पहला ऐसा मामला था, जिसमें एक साथ 38 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी।

दोषियों और राज्य सरकार दोनों ने हाई कोर्ट का रुख किया
स्पेशल कोर्ट के फैसले के बाद सभी दोषियों ने गुजरात हाई कोर्ट में अपील दाखिल की थी। उनका कहना था कि जांच, सबूत और कबूलनामों में कई कमियां हैं और फैसले पर दोबारा विचार किया जाए। वहीं गुजरात सरकार ने भी हाई कोर्ट में याचिका दायर कर फांसी की सजा की पुष्टि करने की मांग की थी।

हाई कोर्ट की मंजूरी क्यों जरूरी होती है
भारतीय कानून के अनुसार, किसी भी निचली अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा तब तक लागू नहीं की जा सकती, जब तक संबंधित हाई कोर्ट उसकी पुष्टि न कर दे। इसी कानूनी प्रक्रिया के तहत यह मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंचा था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को सही माना और फांसी व उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।

पीड़ित परिवारों को मिलेगा मुआवजा
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे का भी आदेश दिया है। ब्लास्ट में जान गंवाने वाले 56 लोगों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये दिए जाएंगे। 200 से अधिक घायलों को 1-1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।

 

खबरें और भी हैं...

Copyright © 2025 Dainik Savera Times. All rights reserved.
ऐप खोलें