नई दिल्ली। भोर की पहली किरण जब शहर की नींद पर धीरे से दस्तक देती है, उसी समय किसी निर्माण स्थल पर हथौड़े की चोटें नए कल की नींव रखने लगती हैं। यह ध्वनि केवल पत्थर नहीं तराशती, बल्कि उस भविष्य को गढ़ती है जिसे हम विकास के नाम से पहचानते हैं।
अदृश्य है भविष्य निर्माता के हाथ
धूल से सने, छालों से भरे ये हाथ ही वे अदृश्य निर्माता हैं, जिनकी मेहनत से कांच जैसी ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कों की रेखाएँ और उड़ान भरते एयरपोर्ट खड़े होते हैं। सुबह पाँच बजे चाय की भाप के बीच वे अपने बच्चों के सपनों को संवारते हैं, जबकि स्वयं शहर की रोशनी से दूर, तिरपाल के साए में रातें काटते हैं। उनकी थकान ही उनकी ताकत है—जीने की, बनाने की और टूटे सपनों को फिर से खड़ा करने की अदम्य जिद। पहली मई इस सच्चाई का स्मरण कराता है कि जिनके हाथों से दुनिया बनती है, उनकी आवाज़ कभी दबाई नहीं जा सकती—वह हर युग में उठती है और व्यवस्था की नींव हिला देने का सामर्थ्य रखती है।
‘अनस्किल्ड’ नहीं हैं हमारे मजदूर
ये मजदूर जिसे हम ‘अनस्किल्ड’ कहकर खारिज करते हैं, दरअसल सबसे जरूरी स्किल रखते हैं — वो स्किल जो मशीनें अभी सीख नहीं पाईं। ये लोग बिना तकनीक के भी प्रकृति के संकेत पहचान लेते हैं, सीमित संसाधनों में समाधान खोज लेते हैं और छोटी-सी सजगता से बड़े जोखिम टाल देते हैं। शहरों की ऊँचाइयाँ इन्हीं के परिश्रम से आकार लेती हैं, फिर भी वे व्यवस्था के किनारों पर ही खड़े रह जाते हैं। कोई तपती सड़क पर डिलीवरी करता है, कोई आग की लपटों में वेल्डिंग कर भविष्य गढ़ता है, तो कोई दूसरों के घरों में सेवा देकर जीवन को सहारा देता है।
समाज की रीढ़ हैं ये समाज की
उनकी पहचान फिर भी केवल ‘मजदूर’ तक सिमटी रहती है। वास्तव में वे समाज की रीढ़ हैं—जिनके बिना आधुनिकता का ढांचा ढह सकता है, और अगर ये हाथ थम जाएँ तो स्मार्ट सिटी का सपना भी बिखर जाएगा। विकास की ऊंचाइयों पर खड़ा आज का भारत, उन्हीं श्रमिक हाथों की नींव पर टिका है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि अनौपचारिक क्षेत्र लगभग 12.81 करोड़ श्रमिकों को रोजगार देता है, जबकि निर्माण क्षेत्र में 90 प्रतिशत से अधिक कार्यबल असंगठित है।
अर्थव्यवस्था को गति दे रहे 15 करोड़ अप्रवासी
करीब 15 करोड़ प्रवासी मजदूर अर्थव्यवस्था को गति दे रहे हैं और अनौपचारिक क्षेत्र कुल जीडीपी का लगभग 50 प्रतिशत योगदान करता है। ई-श्रम पोर्टल पर 31 करोड़ से अधिक श्रमिक पंजीकृत हैं। ये केवल आँकड़े नहीं, बल्कि उन अनगिनत कहानियों की गवाही हैं जहाँ पेट भरने के लिए कोई बिहार से दिल्ली, कोई उत्तर प्रदेश से मुंबई पहुँचता है। उनकी निःशब्द मेहनत ही देश की प्रगति का असली आधार है। अब एआई का युग है। हम स्मार्ट सिटी, ऑटोमेशन और रोबोटिक्स की बात करते हैं, लेकिन एआई भी कहीं न कहीं श्रमिकों की स्किल पर ही निर्भर है।
एआई भी इन कलाकारों के सामने बौना
यह डिजाइन बना सकता है, ड्रोन नियंत्रित कर सकता है और डिलीवरी मार्ग सुधार सकता है, पर ईंट उठाना, वेल्डिंग करना या कठिन परिस्थितियों में काम पूरा करना आज भी मनुष्य के ही बस की बात है। एआई गिग वर्कर्स को बेहतर अवसरों से जोड़ रहा है और 2026 तक एआई-आधारित गिग अर्थव्यवस्था के 335 बिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। फिर भी, एआई थकान का अनुमान लगा सकता है, पर वह वह धैर्य और जिद नहीं दे सकता जो एक मजदूर बारिश में भी काम करते हुए दिखाता है। एआई मजदूरों का विरोधी नहीं, बल्कि सही उपयोग होने पर उनका सहयोगी बन सकता है।
तपती धूप और ठंडी रातों से नहीं डिगता हौसला
मजदूरों का संघर्ष अब केवल वेतन या कार्य-घंटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सम्मान, सुरक्षा और सुरक्षित भविष्य की लड़ाई बन चुका है। गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाले लाखों युवा तपती धूप और ठंडी रातों में सेवाएं देते हैं, फिर भी उन्हें पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। महिलाएँ घरेलू कार्य से लेकर निर्माण स्थलों तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, लेकिन समान अवसर और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अभी भी गंभीर कमी है। 1 मई 2026 इन्हीं प्रश्नों—महिला सशक्तिकरण, कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय—पर केंद्रित है।
मजदूरों की चुप्पी छोड़ती है गहरा प्रश्न
इतिहास साक्षी है कि मजदूरों की एकजुटता ने बदलाव रचे हैं, चाहे 1886 का शिकागो हो या आज का भारत। उनकी चुप्पी भी एक गहरा प्रश्न छोड़ती है—क्या उनकी भागीदारी के बिना प्रगति संभव है? हमें ऐसे समाज की आवश्यकता है जहाँ मेहनत को किसी वर्ग या दर्जे से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक मूल्य और गरिमा के आधार पर देखा जाए। जहाँ कोई बच्चा अपने पिता को मजदूर कहकर शर्मिंदा न हो, बल्कि पूरे गर्व से उनका सम्मान करे। नीतियाँ ऐसी हों कि एआई मजदूरों का सशक्त सहायक बने—उन्हें ऑनलाइन कौशल प्रशिक्षण, वास्तविक समय सुरक्षा निगरानी और न्यायसंगत आय की सुनिश्चितता दे। निर्माण स्थलों पर एआई-सहायता प्राप्त आधुनिक उपकरण श्रम का बोझ भले हल्का करें, लेकिन आत्मसम्मान और गौरव को कभी कम न करें।
मुस्कान के बिना उपलब्धि रहेगी अधूरी
जब तक उनकी मुस्कान विकास की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनती, तब तक हर उपलब्धि अधूरी ही रहेगी। श्रम की धड़कनों से गढ़ी यह दुनिया किसी एक दिन की पहचान नहीं मांगती, बल्कि निरंतर सम्मान चाहती है। इस 1 मई को केवल अवकाश न समझें, बल्कि उन हाथों को महसूस करें जो ईंट-पत्थर जोड़कर हमारे सपनों के शहर बनाते हैं। उनकी जीवन-कहानियों को सुनें, उनकी आवाज़ को मंच दें और उनके परिश्रम को वह स्थान दें जो वास्तव में उनका अधिकार है। वे लोग जो शहरों की परछाइयों में रहकर भी राष्ट्र की प्रगति का भार उठाते हैं, असली निर्माता वही हैं। जब हर श्रमिक का सम्मान समाज की ऊँचाई बनेगा, तभी विकास का अर्थ पूर्ण और सार्थक होगा। यह दिन हमें याद दिलाता है कि परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति श्रम के मौन पसीने में छिपी होती है।
-कृति आरके जैन
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