
चंडीगढ़: जांच एजेंसी को एक बड़ा कानूनी झटका देते हुए, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मंगलवार को CBI की चार्जशीट के साथ-साथ हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और द एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के खिलाफ नेशनल हेराल्ड से जुड़े पंचकूला इंस्टीट्यूशनल-प्लॉट री-अलॉटमेंट केस में ट्रायल कोर्ट के लगाए गए आरोपों को भी रद्द कर दिया।
44 पेज के डिटेल्ड जजमेंट के ज़रिए दिया गया यह फैसला जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने लिखा था, जिन्होंने यह साफ़ किया कि जांच एजेंसियां सिर्फ़ शक या राजनीतिक वजहों से कोर्ट की भूमिका में नहीं आ सकतीं या एडमिनिस्ट्रेटिव फैसलों को क्रिमिनल केस में नहीं बदल सकतीं।
एडमिनिस्ट्रेटिव फैसला, क्रिमिनल ऑफेंस नहीं
मामले की जड़ में पंचकूला में एक इंस्टीट्यूशनल प्लॉट का AJL को री-अलॉटमेंट था। यह प्लॉट असल में दशकों पहले पब्लिकेशन से जुड़े मकसदों के लिए अलॉट किया गया था, लेकिन बाद में कंस्ट्रक्शन न होने की वजह से इसे फिर से ले लिया गया था। 2005 में, भूपिंदर सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्री और संबंधित डेवलपमेंट अथॉरिटी के एक्स-ऑफिशियो चेयरमैन बनने के बाद, री-अलॉटमेंट चार्ज और दूसरे बकाए के पेमेंट पर प्लॉट को वापस करने का फैसला लिया गया।
AJL ने ज़रूरी रकम जमा की, कंस्ट्रक्शन शुरू किया, और बाद में उसे ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट दे दिया गया। बाद में अथॉरिटी ने री-अलॉटमेंट के फैसले को एक्स-पोस्ट फैक्टो मंज़ूरी दे दी।
क्रिमिनल कार्रवाई, जो एक विजिलेंस जांच के तौर पर शुरू हुई और बाद में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को सौंप दी गई, ने एडमिनिस्ट्रेटिव कार्रवाई के इस सिलसिले को धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से जुड़ी एक क्रिमिनल साज़िश के तौर पर दिखाने की कोशिश की।
जांच करने वालों को कोर्ट का कड़ा संदेश
जस्टिस दहिया ने पाया कि CBI का तरीका असल में गलत था। कोर्ट ने कहा कि री-अलॉटमेंट के फैसले को किसी भी काबिल ज्यूडिशियल या कानूनी फोरम ने कभी रद्द नहीं किया था। ऐसे हालात में, जांच एजेंसी खुद से गैर-कानूनी होने का अंदाज़ा नहीं लगा सकती और फिर उस अंदाज़े को क्रिमिनल चार्ज के आधार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकती।
इस फैसले ने एक ज़रूरी बात पर ज़ोर दिया: क्रिमिनल लॉ को एडमिनिस्ट्रेटिव या पॉलिसी रिव्यू के बदले इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां कानून और सबूतों से बंधी होती हैं—न कि पॉलिसी फैसलों की पिछली तारीख से दोबारा व्याख्या से, जो कानून की नज़र में सही रहते हैं।
बड़े मतलब
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला मौजूदा मामले से कहीं ज़्यादा अहमियत रखता है, क्योंकि यह एडमिनिस्ट्रेटर्स, जांच करने वालों और अदालतों के बीच इंस्टीट्यूशनल सीमाओं को मज़बूत करता है। कथित एडमिनिस्ट्रेटिव गड़बड़ियों और क्रिमिनल गलती के बीच एक साफ़ लाइन खींचकर, हाई कोर्ट ने दोहराया है कि पॉलिसी फैसले, भले ही विवादित हों, अपने आप क्रिमिनल अपराधों में नहीं बदल जाते।
चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को रद्द करने के साथ, यह फैसला भूपिंदर सिंह हुड्डा और AJL को काफ़ी राहत देता है, साथ ही जांच एजेंसियों को राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में ज़्यादा दखल देने के खिलाफ चेतावनी भी देता है।
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