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हरियाणा में 200 से ज्यादा किसानों ने पराली जलाने को रोकने के लिए एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया

चंडीगढ़: क्षेत्र में पराली जलाने को रोकने के प्रयासों को मजबूत करने के लिए शुक्रवार को 200 से अधिक किसानों, सरकारी अधिकारियों और उद्योग के सदस्यों ने हरियाणा के रानिया ब्लॉक में एक किसान आउटरीच कार्यक्रम में हिस्सा लिया।यह कार्यक्रम सीआईआई द्वारा आयोजित किया गया था, जो पंजाब-हरियाणा के 430 गांवों में जागरूकता सत्र, मशीनरी सहायता और तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से पराली जलाने के विकल्पों को बढ़ावा देने वाली क्षेत्रीय पहल का समर्थन कर रहा है।

इस आयोजन को अप्रावा एनर्जी द्वारा समर्थति किया गया था जो हरियाणा में फसल अवशेष प्रबंधन पहल में सीआईआई के साथ साझेदारी कर रही है।सीआईआई और अप्रावा 2019 से सिरसा जिले में फसल अवशेष प्रबंधन पर काम कर रहे हैं। इन्होंने 33,770 एकड़ भूमि और 6,795 किसानों को कवर करने वाले 26 गांवों को गोद लिया है।कुल मिलाकर, हरियाणा में सीआईआई ने कॉरपोरेट के साथ साझेदारी में 77 गांवों को गोद लिया है, जिनमें अप्रावा एनर्जी, एसबीआई कार्ड, ओएनजीसी और बिड़लासॉफ्ट शामिल हैं। जहां 240 मशीनों के साथ छह कस्टम हायरिंग सेंटर लगाए गए हैं, जिनका प्रबंधन सीआईआई द्वारा गठित किसान सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है।

2022 में परियोजना के हस्तक्षेप के कारण सिरसा के 26 प्रभावित गांवों में पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई क्योंकि सैकड़ों किसान शून्य-पराली जलाने वाला आंदोलन बनाने के लिए परियोजना में शामिल हुए थे।जबकि पिछले वर्ष तक हस्तक्षेपों का ध्यान इन-सीटू उपायों पर था। वर्तमान सीज़न में सीआईआई द्वारा सिरसा में पुआल के प्रबंधन के लिए ग्राम-स्तरीय एक्स-सीटू हस्तक्षेपों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ऊर्ज मंत्री रणजीत सिंह और सिरसा की संसद सदस्य सुनीता दुग्गल द्वारा बायोगैस इकाई और भूसे आधारित खाद इकाई का उद्घाटन था।

सिरसा और फतेहाबाद में तीन अन्य बायोगैस इकाइयां पहले से ही चालू हैं और तीन महीने के चक्र के लिए 1.6 मीट्रिक टन बायोमास पुआल और 4 मीट्रिक टन गाय के गोबर का उपयोग कर सकती हैं और इसे एक छोटे परिवार के लिए पर्याप्त रसोई गैस में बदल सकती हैं।पुआल-आधारित खाद इकाई की क्षमता प्रति माह 16 मीट्रिक टन धान के भूसे को 32 मीट्रिक टन खाद में बदलने की है, जो दो चरण के ठोस-अवस्था पाचन के बाद 30-35 दिनों में किसानों द्वारा उपयोग के लिए तैयार हो जाएगी।कार्यक्रम में बोलते हुए रणजीत सिंह ने कहा कि पराली जलाने के कारण, हमने गांवों से बहुत सारी वनस्पतियों और जीवों को खो दिया है और हम प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं और प्रकृति इसे भूकंप और बाढ़ के रूप में वापस कर रही है।

खराब वायु गुणवत्ता, बच्चों और बुजुर्गों पर इसके प्रभाव के कारण लोग दिल्ली से बाहर जा रहे हैं और फार्महाउस का एक नया चलन शुरू हो गया है। उन्होंने किसानों से पराली जलाने से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ विकल्प अपनाने का आग्रह किया।पराली जलाने के नकारात्मक प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए सुनीता दुग्गल ने कहा कि जिले में एक मृदा स्वास्थ्य प्रयोगशाला शुरू की गई है और सभी किसानों को इससे लाभ प्राप्त करने के लिए अपने नमूनों का परीक्षण करना चाहिए।

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