
सोनीपत: सोनीपत के प्रसिद्ध मुरथल ढाबों पर इन दिनों कमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी का सीधा असर देखने को मिल रहा है। गैस की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण कई ढाबा संचालकों को अपने पारंपरिक तरीकों की ओर लौटना पड़ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि ढाबों की रसोई अब फिर से लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर निर्भर होती जा रही है। ढाबा संचालकों ने ग्राहकों को किसी तरह की असुविधा न हो, इसके लिए वैकल्पिक इंतजाम भी किए हैं।
मुरथल ढाबा एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंजीत सिंह का कहना है कि कमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी का सबसे ज्यादा असर छोटे ढाबा संचालकों पर पड़ रहा है। बड़े ढाबों के पास कुछ वैकल्पिक साधन मौजूद हैं, लेकिन छोटे ढाबों के लिए गैस की कमी बड़ी समस्या बन गई है। इसी कारण कई ढाबा संचालक अब लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर शिफ्ट हो गए हैं, जबकि कुछ ने इंडक्शन चूल्हों का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है। रेशम ढाबा के मैनेजर मंगत राम के अनुसार गैस की समस्या के चलते उनके ढाबे पर गैस का उपयोग करीब 70 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है।
फिलहाल गैस का इस्तेमाल केवल 30 प्रतिशत कामों में ही किया जा रहा है, जिसमें मुख्य रूप से तवे की रोटी और पराठे बनाना शामिल है। बाकी अधिकांश खाना अब लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर तैयार किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार मुरथल के ढाबों में बेस किचन के लगभग 10 से 12 आइटम पहले गैस पर ही तैयार किए जाते थे। इनमें रेड और व्हाइट ग्रेवी, चॉक मसाला, कढ़ाई पनीर, बटर मसाला, मिक्स वेज, येलो दाल और दाल मखनी जैसे लोकप्रिय व्यंजन शामिल हैं। इन सभी व्यंजनों को तैयार करने में गैस का काफी अधिक उपयोग होता था, लेकिन अब गैस की कमी के कारण इन्हें भी लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर बनाया जा रहा है।
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