हिमाचल डेस्क: कुल्लू घाटी में मनाए जाने वाले होली का त्यौहार खास महत्व रखता है। यहां मथुरा वृंदावन की तरह ही 40 दिनों तक होली का त्यौहार मनाया जाता है। ऐसे में भगवान रघुनाथ के कुल्लू आगमन से ही इसका नाता माना जाता है। कुल्लू स्थित हनुमानी बाग के नरसिंह मंदिर में ऐसी ही होली संध्या का आयोजन वैरागी समुदाय द्वारा किया गया। ऐसे में यहां होली के पारम्परिक गीतों का गायन किया गया।
एकादशी महंत ने बताया कि कुल्लू में बसंत पंचमी से ही वैरागी समुदाय की होली शुरू हो जाती है। ऐसी में भगवान रघुनाथ के दरबार में पहला होली का गायन होता है। इसके बाद वैरागी समुदाय द्वारा 40 दिनों तक अलग अलग स्थानों में होली संध्या का आयोजन होता है। उन्होंने बताया कि भगवान रघुनाथ के साथ ही उनके पूर्वज अयोध्या से कुल्लू आए थे। ऐसे में यहां तभी ये मधुरा वृन्दावन की तरह ही स्वयं त्यौहारों को मनाने की रीत शुरू की गई है।
महंत समुदाय से संबंध रखने वाली श्याम सुंदर मंहत ने बताया कि कुल्लू में गए जाने वाले होली की गीत ब्रज भाषा के पारंपरिक गीत है, जिनका आज भी गायन होता है। उन्होंने बताया को होलाष्टको में वैरागी समुदाय का विशेष महत्व रहता है। इस दौरान यहां वैरागी समुदाय के लोग भगवान रघुनाथ के दरबार में होली गायन और रंग खेलने जाते है। उन्होंने बताया कि भगवान रहूंगा के कुल्लू आगमन के साथ ही वैरागी समुदाय के गुरु राज परिवार के गुरु बने थे, ऐसे में यहां वैरागी समुदाय का अहम महत्व रहता है।
रजनी महंत बताती है कि आज भी वैरागी समुदाय के लोग पारंपरिक होली का आयोजन कर रहे है। ऐसे में था बेहद खूबसूरत बात है किआज की पीढ़ी भी इस परंपरा का निर्वहन कर रही है।
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