
Kui Kanda Nag Devta Reaches Kullu Dussehra : कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में जिला कुल्लू के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं के पहुंचने का सिलसिला जारी है। इसी बीच निरमंड क्षेत्र के तांदी गांव के कुई कंडा नाग देवता अपनी अनूठी परंपरा और प्राचीन मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
मान्यता है कि देवता किसी भी व्यक्ति के मुख्य द्वार, छत या टनल के नीचे से होकर नहीं गुजरते। देवता के गुर विनोद ठाकुर के अनुसार, देवता के साथ हारियान और देवलु करीब 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर ढालपुर मैदान पहुंचे हैं। बीते वर्ष से देवता ने दोबारा दशहरा उत्सव में भाग लेना शुरू किया है। उत्सव में देव मिलन, पारंपरिक देव गायन और नृत्य देखने के लिए रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
ऐसे में जिला कुल्लू के उपमंडल आनी के एक देवता ऐसे हैं जो आज भी किसी का भी मुख्य द्वार नहीं लांघते हैं। दशहरा उत्सव की शुरुआत में राजा के द्वारा उन्हें आमंत्रित किया गया और जब जबरदस्ती राजमहल के मुख्य द्वार को के भीतर देवता को ले जाया जाने लगा। तो देवता नाराज हो गए। ऐसे में देवता ने दशहरा उत्सव में आना ही बंद कर दिया था, लेकिन श्रद्धालुओं के आग्रह पर बीते साल से वह अब दशहरा उत्सव में भाग ले रहे हैं। वह देवता है कुई कंडा नाग जो ढालपुर मैदान में विराजे हैं और देवी देवताओं से मिलन की परंपरा को भी निभा रहे हैं।
जिला कुल्लू के उपमंडल निरमंड की उप तहसील निथर के तांदी गांव से देवता इस साल भी अपने हारियान व देवलु के संग दशहरा उत्सव के लिए पहुंच गए हैं। देवता के गुर विनोद ठाकुर ने बताया कि कुई कंडा नाग देवता किसी भी प्रकार की छत, प्रवेश द्वार और टनल होकर नहीं गुजरते हैं। वह लगभग 180 किलोमीटर से पैदल चलकर देवता को हारियान व देवलु कुल्लू पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि साल 1660 में देवता कुल्लू और थे लेकिन किन्ही कारणों से देवता ने दशहरा उत्सव में आना बंद कर दिया था। अब बीते साल से देवता दशहरा उत्सव में आ रहे हैं।
रोजाना हजारों श्रद्धालु देवता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। गुर विनोद ठाकुर ने बताया कि तांदी के देवता कुई कंडा नाग को बूढ़ी नागिन माता का सबसे बड़ा पुत्र माना जाता है। इन्हें नौ नाग (नसेसर) के नाम से भी जाना जाता है। बूढ़ी नागिन माता के सरयोलसर झील में भी सभी देवता सीधे झील के चारों ओर परिक्रमा करते हैं लेकिन कुई कांडा नाग उलटी परिक्रमा देते हैं। वही, विशेष रूप से सूखे या प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए देवता को जाना जाता है। गुर विनोद ठाकुर ने बताया कि तांदी, शेउगी, लटाडागई, घोरला, रूवा, ग्वाल, लुहरी में भी देवता के मंदिर है। देवता का मंदिर तीन गढ़ हिमरी, सिरिगढ, नारयण गढ की चोटी पर स्थित है।
देवता के साथ छियारा, पांचवीर, जल देवता, मशान देवता, बंशीरा, न्या देवता, जाछनी देवता, काली भगवती भी वास करते हैं। इसके अलावा देवता के रथ में माता भुवनेश्वरी और माता जलेश्वरी भी विराजमान है। पुजारी धर्मपाल शर्मा ने बताया कि दशहरा उत्सव के दौरान देवता यहां पर अन्य देवी देवताओं के साथ मिलन भी कर रहे हैं और यहां पर देव गायन भी किया जा रहा है। देव नृत्य के दौरान जो पुराने गीत गाए जा रहे हैं। वह सिर्फ देवता के सम्मान में ही गए जाते हैं और विशेष अवसर पर ही इन गीतों का गायन किया जाता है। ऐसे में इस देव मिलन की परंपरा को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु रोजाना ढालपुर पहुंच रहे हैं।
धर्मपाल शर्मा श्रद्धालु शिव कुमार ठाकुर ने बताया कि वह भी देवता के साथ ढालपुर मैदान पहुंचे हैं। यहां पर आज क्षेत्र से जो भी देवता आए हैं। उनके साथ देवता के द्वारा मिलन किया जा रहा है। देवता की पूरे इलाके में काफी मानता है और प्राकृतिक आपदा तथा महामारी से देवता हमेशा अपने भक्तों का बचाव करते हैं।
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