
शिमला: साल दर साल प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेल रहे हिमाचल के विकास को ढुलमुल रवैय्ये की नजर लगी है। बेशक बीते तीन सालों में प्रदेश में आपदा का घनत्व पहले के मुकाबले अधिक हो, मगर इस त्रसदी के लिए सिर्फ प्राकृतिक ही नहीं, बल्कि मानव जनित क्रिया कलाप भी कुछ हद तक जिम्मेवार हैं। नदियों के किनारे फल्ड जोन में बने मकान अथवा होटलों के साथ-साथ अवैध डंपिंग व गैर कानून खनन भी तबाही की वजह बन रहा है। हाल ही के सालों को देखें तो प्रदेश में साल 2004 में पारछू से सतलुज में बाढ़ आई। पारछू चीन अधिकृत तिब्बत में झील है। झील से पानी का बहाव तेज हो गया तथा खाब से लेकर सुन्नी तक सतलुज में जलस्तर बढ़ गया।
सतलुज में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए सभी चौकस हुए। तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह ने उस वक्त भी लोगों से नदियों व नालों से दूर घर बनाने का आह्वान किया था। बाकायदा नदियों व नालों से दूर घर बनाने के नियम बने हैं। नदियों से 100 मीटर दूर ही निर्माण किया जा सकता है, मगर यह नियम सिर्फ कागजों में है।
नियमों को लागू करने वाली एजैंसियां इसे किस ढंग से लागू करती है कि प्रभावशाली लोग नदियों के साथ ही होटलों, रेस्टोरेंट अथवा अन्य व्यवसायिक गतिविधियों को करने के लिए स्वतंत्र हैं, मगर आम आदमी नहीं। निर्माण की अनुमति देने से पहले फ्लड जोन बारे प्रमाण पत्र नहीं लिया जाता, न ही भूमि की बनावट का ही पता लगाया जाता है।
प्रभावशाली लोग जिनमें कुछ अफसर व कुछेक राजनेता शामिल रहते हैं, के लिए नियम लागू करने वाली एजैंसियां आंखें मूंद लेती हैं। 2023 में प्रदेश में आई प्राकृतिक आपदा के दौरान यह पहलू मालूम हुआ तथा नियमों को लागू करने वाली एजैंसियां बेनकाब हुई। न सिर्फ करोड़ों की निजी संपत्तियां जमींदोज हुई, बल्कि सरकारी संपत्तियां भी मिट्टी में मिल गई। अवैध खनन व डंपिंग भी प्राकृतिक आपदा के दौरान मचने वाली तबाही की एक वजह मानी जा रही है। अवैध डंपिंग से तेज बारिश होने की स्थिति में खड्डों व नालों के साथ साथ नदियों मिट्टी व पत्थर बह कर आते हैं इससे बाढ़ जैसे हालात बनते हैं। बारिश अधिक तेज होने पर यह मलवा भयावह रूप धारण कर लेता है। अवैध खनन रोकने के लिए भी फाइलों व कानून की किताबों में कायदे बने हैं, मगर लागू करने वाली एजैंसियां खामोश रहती हैं।
साल 2023, 2024 व 2025 ही नहीं लगातार हर साल बीते तीन दशकों से विधानसभा में अवैध खनन का मुद्दा गूंज रहा है, मगर साल दर साल प्राकृतिक आपदा के बाद घड़ियाली आंसू तो सभी बहाते हैं, मगर इसे रोकने ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही। फोरलेन निर्माण के लिए पहाड़ों को बेतरतीब ढंग से काटा जा रहा है। सैंकड़ों सालों से मिट्टी को पकड़े व जकड़े रखने वाले पेड़ों की बलि दी जा रही है। प्रदेश में आज भी ग्रामीण इलाकों में सैंकड़ों सड़कें बगैर किसी अनुमति के बनी हैं। इन सड़कों के निर्माण के लिए पहाड़ों का सीना चीरा गया।
जाहिर है कि प्राकृतिक आपदा के लिए प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानवीय क्रिया कलाप भी कुछ हद तक जिम्मेवार है, अन्यथा हिमाचल में बारिश तो पहले भी इससे अधिक होती रही हैं। लिहाजा पहाड़ के विकास के मॉडल के लिए टोपोग्राफी के मद्देनजर ही कायदे कानून बना कर उन्हें सख्ती से लागू करने की दरकार है। अन्यथा सरकारें आपदा पीड़ितों के पुनर्वास के लिए भूमि तलाशती रहेंगी, क्योंकि 1952 की एवरी वेस्ट लैंड इज फॉरेस्ट लैंड, अधिसूचना से हो रही दिक्कत का समाधान अभी तक तलाशा नहीं जा सका है, इस मसले पर सियासत अवश्य हो रही है।
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