
शिमला: शिमला ऐतिहासिक गेयटी थिएटर सभागार शिमला में आज प्रख्यात कथाकार एस.आर. हरनोट के बहुचर्चित उपन्यास ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ पर न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित और डॉ. राजेंद्र बड़गूजर द्वारा संपादित आलोचना कृति का लोकार्पण संपन्न हुआ। यह लोकार्पण डॉ. राजेंद्र बड़गूजर (प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतीहारी, बिहार), श्री राकेशरेणु (वरिष्ठ कवि, आलोचक एवं संपादक), जय प्रकाश पांडेय (पत्रकार, संपादक एवं साहित्य मीमांसक, इंडिया टुडे समूह, दिल्ली) और इस कृति के प्रकाशक एम.एम. चंद्रा (न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, दिल्ली) के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। उनके साथ मंच पर उपन्यास के लेखक एस.आर. हरनोट, पुस्तक विमर्शकार डॉ. हेमराज कौशिक, प्रो. मीनाक्षी एफ. पॉल, श्री जगदीश बाली, डॉ. प्रशांत रमण रवि, अभिषेक तिवारी और डॉ. दिनेश शर्मा उपस्थित रहे। हिमालय साहित्य संस्कृति एवं पर्यावरण मंच द्वारा आयोजित इस भव्य लोकार्पण समारोह में मंच पर विराजमान सभी अतिथियों का मंच के अध्यक्ष एवं साहित्यकार एस.आर. हरनोट ने हिमाचली टोपी, शॉल और मफ़्लर पहनाकर स्वागत किया। उन्होंने इस आयोजन में पधारे लेखकों और साहित्य प्रेमियों का भी विशेष आभार एवं स्वागत किया। यह जानकारी मंच के मीडिया समन्वयक अभिषेक तिवारी ने मीडिया को दी।
उन्होंने बताया कि उपन्यास ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ पर आलोचना कृति के संपादन की परिकल्पना जाने-माने साहित्यकार डॉ. राजेंद्र बड़गूजर ने उन दिनों तैयार कर ली थी जब वे शिमला उच्च अध्ययन संस्थान में बतौर फेलो के रूप में कार्यरत थे। उनके प्रयासों से ही देशभर के जिन प्रख्यात आलोचकों के आलेख इस कृति में संकलित हो पाए, उनमें अब्दुल बिस्मिल्लाह, सूरज पालीवाल, राकेश कुमार सिंह, साधना अग्रवाल, राकेशरेणु, हेमराज कौशिक, हूबनाथ पांडेय, अंकित नरवाल, अनीश सिरियक, रमेश प्रताप सिंह, मधुबाला शुक्ला, गीताश्री, जय प्रकाश पांडेय, नीलाभ कुमार, प्रशांत रमण रवि, अमिय बिंदु, राजन तंवर, राजेंद्र बड़गूजर और इंद्रसिंह ठाकुर शामिल हैं। ये सभी आलेख देश की बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं में पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं। इन आलोचना आलेखों से उपण्यास की विश्वसनीयता और भी बढ़ी है।
उन्होंने आगे कहा कि इस अवसर पर कृति के संपादक राजेंद्र बड़गूजर ने पुस्तक की रूपरेखा और उपन्यास के महत्व पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने उन सभी आलोचकों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने बहुत गहराई से उपन्यास पर आलेख लिखे हैं। उन्होंने प्रसिद्ध उपन्यासकार और आलोचक डॉ. अब्दुल बिस्मिल्लाह का ज़िक्र करते हुए कहा कि बिस्मिल्लाह जी की दृष्टि में यह उपन्यास एक महाकाव्य जैसा है, जिसके उन्होंने कारण भी बताए हैं। उन्होंने आगे कहा कि ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ उपन्यास हमारे समय का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है, जो पहाड़ी जीवन की लोक-संस्कृति में नदी और स्त्री की अदम्य जिजीविषा का उद्घाटन करते हुए पहाड़ों में पर्यावरण को पहुंचाई जा रही क्षति को बारीकी से उजागर करता है। यह चिंता वैश्विक है।
कवि-आलोचक राकेशरेणु ने कहा कि ‘हिडिम्ब’ के बाद हरनोट का यह दूसरा उपन्यास है। दोनों में ही पर्यावरणीय चिंताएं विशेष रूप से उद्घाटित हुई हैं। उनका मानना है कि हिडिम्ब की ‘विपु’ और नदी-रंग जैसी लड़की की ‘शतु’ विपाशा और सतलुज नदियों के ही संक्षिप्त बाल रूप हैं जिनके मनुष्य द्वारा विनाश के साथ उनके उग्र रूपों का भी साक्षात वर्णन है। जय प्रकाश पांडेय ने ‘हिडिम्ब’ व हरनोट की कविताओं के परिप्रेक्ष्य में ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ का विश्लेषण करते हुए कहा कि उपन्यास की नायिका ‘सुनमा दादी’ का जीवन सामान्य नहीं है। उसे असामान्य बनाने में हमारे तथाकथित विकास की बड़ी नकारात्मक और अमानवीय भूमिका रही है।
पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण क्षरण पर चिंता प्रकट करते हुए वरिष्ठ कवि और आजकल के पूर्व प्रधान संपादक राकेशरेणु और जयप्रकाश पांडेय ने हिमाचल की शासन व्यवस्था , खास तौर पर शिमला प्रशासन से अपील की कि इस विरासत न में पेट्रोल और डीजल वाहनों को परिचालन पूरी तरह बंद हो । उनकी जगह पर इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी चालित सीएनजी वाहनों के प्रयोग को वरीयता दी जाए । यह प्रक्रिया सरकारी वाहनों से शुरू की जाए । साथ ही लोगों से अपील की जाए कि प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण रक्षा के लिए पेट्रोल और डीजल वाहनों का प्रयोग हिमाचल, खासतौर पर शिमला में बिलकुल न हो।
पुस्तक के प्रकाशक एम.एम. चंद्रा ने हरनोट और बड़गूजर जी का आभार प्रकट किया कि एक चर्चित और महत्वपूर्ण उपन्यास पर आलोचना कृति के प्रकाशन का सौभाग्य न्यू वर्ड पब्लिकेशन को प्रदान हुआ है। उन्होंने दोनों को इस बेहतर कार्य के लिए बधाई भी दी। डॉ. हेमराज कौशिक ने उपन्यास के बहाने हरनोट की पर्यावरणीय चिंताओं को गहराई से रेखांकित किया। डॉ. मीनाक्षी एफ. पॉल ने हरनोट, प्रकाशक और संपादक को इस कृति के लिए बधाई देते हुए कहा कि वह इन दिनों इस उपन्यास का अंग्रेजी में अनुवाद कर रही हैं, क्योंकि यह उनका प्रिय उपन्यास है और आज के पर्यावरण विमर्श पर विस्तार से बात करता है।
जगदीश बाली ने कहा कि यह उपन्यास एक ओर जहां अवैज्ञानिक और अनियोजित विकास को रेखांकित करता है, वहीं हिमाचल में स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर कोरोना काल तक की बात भी करता है। प्रशांत रमण रवि का मानना था कि यह उपन्यास मनुष्य द्वारा मनुष्य के लिए क्रिएट की जा रही त्रासदी का एक जीवंत दस्तावेज बनकर हमारे सामने उपस्थित होता है। अभिषेक तिवारी ने उपन्यास को काव्यात्मक बताते हुए इसकी भाषा की मिठास पर बात की और पर्यावरण जैसे ज्वलंत मुद्दों को अपनी लेखनी के माध्यम से निरंतर उठाए जाते रहने के लिए हरनोट का आभार भी व्यक्त किया।
मंच संचालन कर रहे डॉ. दिनेश ने सम्मानित अतिथियों का विस्तार से परिचय दिया और हिमालय मंच तथा उपन्यास के बारे में जरूरी बातें भी बताईं। उन्होंने बताया कि यह उपन्यास वर्ष 2022 में वाणी प्रकाशन से उनकी महत्वपूर्ण सीरीज ‘सृष्टि’ के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है और अब तक इसके तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। बीदर यूनिवर्सिटी (कर्नाटक) के BCA-3 पाठ्यक्रम में यह उपन्यास पढ़ाया जा रहा है और हाल ही में इसका स्टूडेंट संस्करण भी आया है। देश की विभिन्न यूनिवर्सिटीज़ में कई पीएचडी शोधों में यह उपन्यास शामिल है। हाल ही में इस उपन्यास का मलयालम अनुवाद प्रख्यात मलयालम और हिन्दी लेखिका ने किया है जो केरल यूनिवर्सिटी में आचार्य एवं पूर्व विभागाध्यक्ष हैं।
सभागार लेखकों और पाठकों से खचाखच भरा था। बहुत से वरिष्ठ और युवा लेखकों के साथ छात्र और श्रोता भी उपस्थित रहे। धन्यवाद प्रस्ताव कवि आलोचक डॉ.सत्यनारायण स्नेही ने प्रस्तुत किया।
📍 Location: शिमला (शिमला)
मेष: दिन शुभ रहेगा...