शिमला। भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता त्रिलोक कपूर ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2026-27 से 2029-30 तक तैयार की गई मध्यम अवधि ऋण प्रबंधन रणनीति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को कर्ज के पुनर्भुगतान की समयसीमा बढ़ाने के साथ-साथ राजस्व बढ़ाने, अनुत्पादक व्यय नियंत्रित करने और वित्तीय घाटा कम करने की ठोस कार्ययोजना भी जनता के सामने रखनी चाहिए।
कपूर ने कहा कि 20 सितंबर को प्रकाशित समाचार के अनुसार हिमाचल सरकार ने अगले चार वर्षों में ऋण और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का अनुपात घटाकर 40.64 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। इसी रिपोर्ट में सितंबर 2026 तक प्रदेश पर करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज होने का उल्लेख किया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार यह स्पष्ट करे कि अगले चार वर्षों में राज्य की आय कितनी बढ़ने का अनुमान है, कुल बकाया कर्ज में क्या परिवर्तन होगा और ब्याज भुगतान का बोझ किस प्रकार कम किया जाएगा। कपूर ने कहा कि ऋण-जीडीपी अनुपात में कमी और कुल बकाया कर्ज में वास्तविक कमी दो अलग-अलग बातें हैं। सरकार को दोनों के लिए अलग-अलग लक्ष्य सार्वजनिक करने चाहिए।
बजट के आंकड़े वित्तीय चुनौतियों की ओर कर रहे संकेत : त्रिलोक कपूर
त्रिलोक कपूर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के वर्ष 2026-27 के बजट विश्लेषण के अनुसार राज्य का राजस्व घाटा 6,577 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। राजस्व घाटा जीएसडीपी का 2.4 प्रतिशत और राजकोषीय घाटा 3.5 प्रतिशत अनुमानित है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमानों में राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 6.6 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान था, जबकि मूल बजट में इसे 4 प्रतिशत रखा गया था। इसी अवधि में राजस्व घाटे का संशोधित अनुमान 9,812 करोड़ रुपये रहा, जो मूल बजट अनुमान से 54 प्रतिशत अधिक था।
कपूर ने कहा कि इन आंकड़ों के संदर्भ में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आगामी वर्षों में राजस्व और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए कौन-से उपाय किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि वित्तीय अनुशासन केवल नए ऋण की अवधि बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। राज्य की आय बढ़ाने, व्यय की प्राथमिकताएं निर्धारित करने और विकास परियोजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन सुनिश्चित करने पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
त्रिलोक कपूर ने कहा कि बजट विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2026-27 में राज्य की कुल प्राप्तियां, उधारी को छोड़कर, 40,389 करोड़ रुपये अनुमानित हैं, जबकि ऋण पुनर्भुगतान को छोड़कर व्यय 50,088 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस अंतर को पूरा करने की वित्तीय व्यवस्था स्पष्ट करनी चाहिए।
कपूर ने कहा कि प्रदेश सरकार की नई रणनीति में पांच वर्ष तक की अवधि वाले नए बाजार ऋण से यथासंभव दूरी बनाने और 15 से 20 वर्ष अथवा उससे अधिक अवधि के बॉन्ड के माध्यम से संसाधन जुटाने की योजना बताई गई है। ऋण की औसत परिपक्वता अवधि मार्च 2025 के 8.15 वर्ष से बढ़ाकर वर्ष 2029-30 तक लगभग 11 वर्ष करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि लंबी अवधि के ऋण से तत्काल पुनर्भुगतान का दबाव कम हो सकता है, लेकिन सरकार को यह भी बताना चाहिए कि इससे कुल ब्याज भुगतान और भविष्य की वित्तीय देनदारियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
त्रिलोक कपूर ने कहा कि समाचार रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार ऋण की औसत ब्याज लागत को वर्ष 2024-25 के 6.77 प्रतिशत से और कम करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने मांग की कि सरकार इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रस्तावित वित्तीय उपाय और अपेक्षित बचत का विवरण सार्वजनिक करे। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति का आकलन करते समय पूर्ववर्ती सरकारों से प्राप्त देनदारियों, वर्तमान सरकार की उधारी, ब्याज भुगतान और विकास व्यय, सभी को ध्यान में रखना आवश्यक है।
कपूर ने राज्य सरकार से मांग की कि चार वर्षीय ऋण प्रबंधन रणनीति के अंतर्गत वर्षवार कुल बकाया कर्ज, ऋण-जीडीपी अनुपात, ब्याज भुगतान, मूलधन पुनर्भुगतान और राजस्व बढ़ाने के प्रस्तावित उपायों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की वित्तीय चुनौतियों का समाधान पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन, राजस्व वृद्धि और विकास संबंधी प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाना चाहिए। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि नई ऋण रणनीति से प्रदेश की आर्थिक स्थिति और विकास कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ने की अपेक्षा है।
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