Last Updated: September 23, 2026

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गणतंत्र दिवस की परेड पर खर्च हुए इतने सौ करोड़ रूपये, जानें टिकट से कितनी हुई कमाई

January 27, 2026

गणतंत्र दिवस की परेड पर खर्च हुए इतने सौ करोड़ रूपये, जानें टिकट से कितनी हुई कमाई

Republic Day parade News : हर साल 26 जनवरी को दिल्ली में होने वाली गणतंत्र दिवस परेड देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय समारोह होता है। इसमें सेना की टुकड़ियां, अलग-अलग राज्यों की झांकियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आधुनिक हथियारों का प्रदर्शन होता है। लेकिन इस भव्य आयोजन पर सरकार कितना खर्च हुआ है, इसकी पूरी और साफ जानकारी आम तौर पर सार्वजनिक नहीं की जाती। फिर भी अलग-अलग RTI (सूचना का अधिकार) से कुछ अनुमानित आंकड़े सामने आए हैं। इन अनुमानों के मुताबिक, गणतंत्र दिवस परेड पर सरकार लगभग 300 से 400 करोड़ रुपये तक खर्च करती है।

टिकट से बहुत कम होती है कमाई
इतने बड़े खर्च के मुकाबले टिकट बेचकर होने वाली कमाई बहुत कम होती है। सरकार परेड के टिकट जानबूझकर सस्ते रखती है। मकसद होता है कि आम लोग भी परेड देख सकें। इसी वजह से कुल खर्च का सिर्फ लगभग 1% पैसा ही टिकट से वापस आ पाता है। यानी यह आयोजन कमाई के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और परंपरा के लिए किया जाता है। RTI से मिली जानकारी के अनुसार 2015 में परेड पर खर्च: लगभग 320 करोड़ रुपये। टिकट से कमाई: केवल 34 लाख रुपये हुई। इससे साफ है कि खर्च और कमाई में बहुत बड़ा अंतर है।

 

शुरुआत में खर्च बहुत कम था

आज भले ही सैकड़ों करोड़ खर्च होते हों, लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था।

वर्ष परेड पर खर्च
1951 ₹18,362
1956 ₹5.75 लाख
1971 ₹17.12 लाख

देश की पहली गणतंत्र दिवस परेड 1951 में हुई थी और उस समय खर्च बहुत कम था क्योंकि आयोजन छोटा था।

समय के साथ खर्च क्यों बढ़ा?
जैसे-जैसे परेड का स्तर बढ़ता गया, खर्च भी बढ़ता गया। वजह है ज्यादा सैन्य टुकड़ियों की भागीदारी, आधुनिक हथियारों और उपकरणों का प्रदर्शन, राज्यों की बड़ी और भव्य झांकियां, सुरक्षा के कड़े इंतजाम, टीवी प्रसारण और तकनीकी व्यवस्था, इसी कारण खर्च लाखों से बढ़कर करोड़ों में पहुंच गया।

1990 के बाद सरकार क्यों नहीं बताती पूरा खर्च?
1990 के दशक के बाद से सरकार परेड के कुल खर्च का सीधा आंकड़ा देने से बचती रही है। सरकार का तर्क है कि परेड की तैयारियों में कई मंत्रालय शामिल होते हैं। राज्य सरकारें भी खर्च करती हैं। केंद्र शासित प्रदेश, सरकारी कंपनियां और दूसरी एजेंसियां भी हिस्सा लेती हैं। हर संस्था अपने अलग बजट से खर्च करती है। इसलिए कुल खर्च को एक जगह जोड़ना मुश्किल बताया जाता है।

 

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