Last Updated: October 14, 2026

Dainik Savera Times Logo

बंद की आड़ में हुआ बवाल तो कितना भारी पड़ेगा, हिंसा पर कितना कड़ा है कानून?

February 12, 2026

बंद की आड़ में हुआ बवाल तो कितना भारी पड़ेगा, हिंसा पर कितना कड़ा है कानून?

Law against violence: किसान संगठनों और देश की 10 बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने गुरुवार को भारत बंद का आह्वान किया है। वर्ष 2025 में लागू किए गए चार नए श्रम कानूनों के विरोध में यह हड़ताल बुलाई गई है। विभिन्न कर्मचारी संगठनों के साथ बैंक कर्मचारियों ने भी इस बंद को समर्थन देने की घोषणा की है। संगठनों ने सप्ताह में पांच दिन कार्य व्यवस्था सहित कई मांगें सरकार के सामने रखी हैं।

देश में भारत बंद या राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान कोई नई घटना नहीं है। अलग-अलग मुद्दों पर समय-समय पर ट्रेड यूनियन, किसान संगठन या अन्य सामाजिक समूह बंद का ऐलान करते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई भी संगठन भारत बंद की घोषणा कर सकता है और अगर प्रदर्शन के दौरान हिंसा होती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

क्या भारत बंद की घोषणा कानूनी है?
संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां नागरिकों को अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है।

ये भी पढ़ें- पुलवामा आतंकी हमले की बरसी से पहले आतंकी साजिश की आशंका, एजेंसियां सतर्क

 

कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि कोई संगठन शांतिपूर्ण तरीके से विरोध या बंद का आह्वान करता है और इससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग नहीं होती, तो उस पर स्वतः कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती।

कब बनता है मामला गैरकानूनी?
स्थिति तब बदल जाती है जब विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप ले लेता है। यदि प्रदर्शनकारी सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाते हैं, आम लोगों को जबरन दुकानें बंद करने के लिए बाध्य करते हैं या गैर-हड़ताली नागरिकों को धमकाते हैं, तो यह कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।

ऐसे मामलों में ‘प्रिवेंशन ऑफ डैमेज टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट, 1984’ के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इस कानून के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर पांच साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट और राज्य सरकारों की पहल
हिंसक प्रदर्शनों की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में स्वतः संज्ञान लेते हुए जस्टिस थॉमस कमेटी और नरीमन कमेटी का गठन किया था, ताकि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए प्रभावी तंत्र विकसित किया जा सके। हालांकि इन सिफारिशों का व्यापक स्तर पर ठोस क्रियान्वयन नहीं हो सका।

ये भी पढ़ें- ‘घूसखोर पंडित’ नाम पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, कहा- टाइटल बदले बिना रिलीज नहीं होगी फिल्म

 

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार ने 2020 में ‘उत्तर प्रदेश कम्पनसेशन फॉर डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी एक्ट’ लागू किया। इस कानून के तहत प्रदर्शन के दौरान हुई संपत्ति की क्षति की भरपाई संबंधित दोषियों से वसूलने का प्रावधान किया गया है।

अधिकार और जिम्मेदारी दोनों जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी कानून-व्यवस्था की रक्षा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, तोड़फोड़ और जबरदस्ती किसी भी स्थिति में वैध नहीं मानी जाती।

 

खबरें और भी हैं...

Copyright © 2025 Dainik Savera Times. All rights reserved.
ऐप खोलें