
Lord Krishna broke Arjuna’s ego : महाभारत के युद्ध के बाद जब चारों ओर पांडवों की विजय का यश गूंज रहा था, तब अर्जुन भी अपने अद्वितीय पराक्रम और धनुर्विद्या की प्रशंसा सुनकर भीतर ही भीतर गर्व से भरने लगे। उन्हें लगने लगा कि कुरुक्षेत्र में मिली विजय का सबसे बड़ा कारण उनकी वीरता और युद्ध कौशल ही था।
भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि सफलता के साथ जन्म लेने वाला अहंकार व्यक्ति के विवेक को धूमिल कर सकता है। अपने प्रिय सखा अर्जुन के मन में उठ रहे इस भाव को पहचानकर श्रीकृष्ण ने उन्हें विनम्रता का वास्तविक अर्थ समझाने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने एक ऐसी लीला रची, जिसने अर्जुन को यह एहसास करा दिया कि मनुष्य चाहे कितना भी सामर्थ्यवान क्यों न हो, ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन के बिना उसका पराक्रम अधूरा है।
एक बार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक दुर्गम रास्ते पर चलने को कहा। रास्ते में अनगिनत पत्थर, कंकड़ और कांटे बिखरे थे। अर्जुन ने पूरी शक्ति और धनुर्विद्या का उपयोग करके उन बाधाओं को बाणों से दूर करने का प्रयास किया, लेकिन वे जितनी कोशिश करते, बाधाएं और अधिक बढ़ती जातीं। अंत में थककर अर्जुन वहीं बैठ गए और बोले कि माधव! यह मार्ग पार करना असंभव है। तब श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए वहां आए। उन्होंने अर्जुन से कहा कि पार्थ! तुमने इन बाधाओं को अपनी शक्ति से जीतने का प्रयास किया, इसलिए वे और जटिल होती गईं। यदि तुमने अहंकार को त्यागकर धैर्य और विनम्रता से मार्ग चुना होता तो ये बाधाएं स्वयं ही रास्ता छोड़ देतीं।
यह पौराणिक कथा आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी तब थी। इससे हमें ये शिक्षाएं मिलती हैं।
सफलता मिलने पर व्यक्ति को कभी भी अपने गुणों या उपलब्धियों पर घमंड नहीं करना चाहिए। अहंकार मनुष्य की बुद्धि और विवेक को हर लेता है।
कई बार बल से अधिक काम धैर्य और विवेक से होता है। उग्रता केवल समस्याओं को बढ़ाती है, जबकि शांति समाधान के द्वार खोलती है।
जीवन की हर जीत में केवल हमारी मेहनत ही नहीं, बल्कि दैवीय कृपा और प्रकृति का भी योगदान होता है। अपनी उपलब्धियों का श्रेय स्वयं लेने के बजाय विनम्रता रखना ही मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान है।
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