Mamata Banerjee lost her TMC office : बंगाल की राजनीति में अब टकराव सिर्फ सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़कों से लेकर पार्टी मुख्यालयों तक खुली जंग का रूप ले चुका है। विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई तृणमूल कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने विस्फोटक मोड़ ले लिया, जब विद्रोही नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने कोलकाता के मेट्रोपालिटन स्थित पार्टी के मुख्य कार्यालय पर कब्जा जमा लिया।
इस घटनाक्रम ने न केवल TMC में गहराते सत्ता संघर्ष को उजागर किया है, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े राजनीतिक भूचाल के संकेत भी दे दिए हैं। इस हाई-प्रोफाइल ‘कब्जे’ के दौरान उनके साथ फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, जावेद खान और अखरुज्जमां जैसे कद्दावर विधायकों का पूरा काफिला मौजूद था, जिसने ममता गुट को हिलाकर रख दिया है। यह घटनाक्रम सिर्फ एक इमारत पर नियंत्रण का मामला नहीं है, बल्कि यह ममता बनर्जी के ‘कालीघाट गुट’ के खिलाफ ऋतब्रत खेमे की सीधी जंग का एलान है।
दिलचस्प बात यह है कि कार्यालय के भीतर ममता बनर्जी की तस्वीरों और कटआउट्स को छुआ तक नहीं गया है। ऋतब्रत गुट ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत साफ किया है कि वे ‘दीदी’ को अपना मार्गदर्शक (परामर्शदाता) मानते हैं, लेकिन वे ममता-अभिषेक की जोड़ी के बिना ही आगे बढ़ेंगे। कार्यालय के बाहर टांगा गया एक नया प्लैकार्ड इस नई हकीकत की गवाही दे रहा है, जिस पर हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय का नाम पार्टी के नए चेयरमैन के रूप में चमक रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन और दिल्ली में चुनाव आयोग के पूर्ण पीठ से मुलाकात के तुरंत बाद उठाया गया यह कदम बेहद सुनियोजित है।
ऋतब्रत खेमे का दावा है कि पार्टी के दो-तिहाई विधायक, पूर्व मंत्री, पार्षद और जिला परिषद सदस्य उनके साथ हैं, इसलिए वही ‘असली तृणमूल’ हैं और इस दफ्तर से उनकी भावनाएं जुड़ी हैं। इस कब्जे के लिए उन्होंने भवन के मालिक मंतू साहा से सीधे बातचीत कर किराए का मामला सुलझाया है—वही मंतू साहा जिनकी कंपनी ‘माडर्न डेकोरेटिंग’ कभी 21 जुलाई की ऐतिहासिक रैलियों के मंच सजाया करती थी और जिन्होंने चुनाव बाद तृणमूल को इमारत खाली करने का अल्टीमेटम दिया था। दूसरी तरफ, कालीघाट स्थित ममता खेमे में इस घटना से भारी आक्रोश है।
ममता खेमे के विधायक कुणाल घोष ने सरकार और पुलिस पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि यह कब्जा पूरी तरह राज्य प्रशासन की मिलीभगत से हुआ है और एक निष्कासित नेता भाजपा की ‘बी टीम’ बनकर यह गंदा खेल खेल रहा है। 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली के आयोजन को लेकर विक्टोरिया हाउस के सामने दोनों गुटों के बीच पहले ही शह-मात का खेल जारी था, जिसे पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी। अब इस नए कार्यालय विवाद ने बंगाल की राजनीति को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां चुनाव चिन्ह और पार्टी फंड की असली लड़ाई का फैसला अब सड़कों से लेकर कोर्ट और चुनाव आयोग के गलियारों तक होना तय है।
Also Read :
मेष: दिन शुभ रहेगा...