नेशनल डेस्क: भारत के चंद्र मिशन चंद्रयान-2 ने चंद्रमा को लेकर एक बड़ी और अहम वैज्ञानिक खोज की है। वैज्ञानिकों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास मौजूद कुछ गहरे गड्ढों यानी क्रेटरों के नीचे पानी की बर्फ होने के मजबूत संकेत मिले हैं। यह जानकारी चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से मिले डेटा के अध्ययन के बाद सामने आई है। इस खोज को भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह शोध अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने किया है। वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद उन क्षेत्रों का अध्ययन किया, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। इन क्षेत्रों को ‘परमानेंटली शैडोड रीजन’ यानी हमेशा छाया में रहने वाला इलाका कहा जाता है। यहां का तापमान माइनस 248 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिसके कारण बर्फ लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती है।
ये भी पढ़ें: कनाडा में भारतीय लड़की की हत्या, लूट के इरादे से आरोपी ने वारदात को दिया अंजाम
इस अध्ययन में चंद्रयान-2 ऑर्बिटर में लगे ड्यूल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (DFSAR) का इस्तेमाल किया गया। यह अत्याधुनिक रडार चंद्रमा की सतह और उसके नीचे मौजूद परतों का पता लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिकों ने रडार से मिले संकेतों का गहराई से विश्लेषण किया और चार ऐसे क्रेटरों की पहचान की, जहां सतह के नीचे पानी की बर्फ मौजूद होने की संभावना काफी ज्यादा है।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक का भी उपयोग किया। इस तकनीक की मदद से यह समझने में आसानी हुई कि रडार से मिलने वाले संकेत चट्टानों से आ रहे हैं या फिर बर्फ से। इसके लिए वैज्ञानिकों ने वृत्ताकार ध्रुवीकरण अनुपात (CPR) और ध्रुवीकरण की डिग्री (DOP) जैसे पैरामीटर का इस्तेमाल किया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, फॉस्टिनी क्रेटर के भीतर मौजूद लगभग 1.1 किलोमीटर चौड़ा एक छोटा क्रेटर सबसे ज्यादा अहम माना जा रहा है। यहां ऐसे संकेत मिले हैं, जो सतह के नीचे बर्फ की मौजूदगी की ओर इशारा करते हैं।
चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी भविष्य
अंतरिक्ष मिशनों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पानी का उपयोग पीने के लिए, ऑक्सीजन बनाने और रॉकेट ईंधन तैयार करने में किया जा सकता है। इससे भविष्य में चंद्रमा पर लंबे समय तक इंसानी मिशन चलाने में मदद मिलेगी।
पिछले कुछ वर्षों से चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव दुनिया भर के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। भारत के चंद्रयान-3 मिशन ने साल 2023 में इसी इलाके के पास सफल लैंडिंग कर इतिहास रचा था। अब चंद्रयान-2 की यह नई खोज चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी को समझने की दिशा में भारत की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
बता दें साल 2019 में चंद्रयान-2 का लैंडर भले ही सफलतापूर्वक चंद्रमा पर उतर नहीं पाया था, लेकिन उसका ऑर्बिटर आज भी सक्रिय है और लगातार महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारियां भेज रहा है। यही ऑर्बिटर अब भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई सफलताएं दिलाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
ये भी पढ़ें: क्या तरबूज को लाल दिखाने के लिए मिलाया जाता है केमिकल रंग? FSSAI ने किया बड़ा खुलासा

