
करनाल। भारत का बासमती चावल सिर्फ एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार में देश की साख का प्रतीक है। वर्ष 2025 में ₹50,000 करोड़ और वर्ष 2026 में रिकॉर्ड ₹55,000 करोड़ का विदेशी मुद्रा राजस्व देश के खजाने में लाने वाला यह उद्योग इस समय एक अभूतपूर्व भू-राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस गया।
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी युद्ध की चिंगारी ने भारतीय चावल निर्यात की सुचारू रूप से चलती आ रही सप्लाई चेन को झुलसा दिया है। करनाल के वरिष्ठ चावल निर्यातक संजय गुप्ता द्वारा साझा जमीनी हकीकत इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यदि इस संकट का समय रहते समाधान नहीं खोजा गया, तो इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं। भारतीय बासमती का पूरा अर्थशास्त्र खाड़ी (गल्फ) देशों के इर्द-गिर्द घूमता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत अपने कुल बासमती निर्यात का 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में भेजता है।
जब तक स्थिति सामान्य थी, भारत से सालाना 60 लाख टन होने वाला निर्यात बढ़कर 70 लाख टन तक पहुंच गया था। लेकिन युद्ध ने इस विशाल बाजार के प्रवेश द्वारों को अवरुद्ध कर दिया है। आज भारत का चावल व्यापारी किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि मानव-निर्मित आर्थिक संकट से जूझ रहा है, जिसके तीन मुख्य पहलू हैं: समुद्री मार्गों पर मंडराते खतरे के कारण शिपिंग कंपनियों ने किरायों में जो बढ़ोतरी की है, वह अकल्पनीय है। एक सामान्य कंटेनर का किराया जो कभी 250 डॉलर हुआ करता था, आज उसके लिए 5,000 डॉलर तक की मांग की जा रही है। इस 20 गुना बढ़ोतरी ने निर्यातकों के प्रॉफिट मार्जिन को पूरी तरह खत्म कर दिया है। यहाँ तक कि यूरोप जैसे शांत क्षेत्रों के लिए भी माल ढुलाई तीन गुना महंगी हो चुकी है।
भारत का पारंपरिक व्यापारिक मार्ग ईरान से होकर गुजरता था, जो वर्तमान में पूरी तरह असुरक्षित और बंद है। इसी तरह, अफगानिस्तान के साथ शुरू हुआ नया व्यापारिक सिलसिला भी थम गया है। इस भौगोलिक गतिरोध का सीधा फायदा पड़ोसी देश पाकिस्तान को मिल रहा है, जो अपने सुगम जमीनी रास्तों से इन क्षेत्रों में सीधी सप्लाई दे रहा है। हालांकि, पाकिस्तान की कुल क्षमता (20 लाख टन) भारत (70 लाख टन) के मुकाबले काफी कम है, फिर भी वह इस शून्य का तात्कालिक लाभ उठा रहा है।
युद्ध केवल जहाजों को नहीं रोकता, वह बैंकिंग चैनलों और पेमेंट्स को भी रोक देता है। डील हो चुकी है, माल जा चुका है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से पैसा समय पर भारत नहीं आ पा रहा है। इससे व्यापारियों के पास दैनिक कारोबार चलाने के लिए नकदी का गंभीर संकट पैदा हो गया है।
उन्होंने बताया कि मिड लिस्ट युद्ध के चलते बासमती चावल के नए ऑर्डर में भी भारी गिरावट देखने को मिल रही है जो लोग पहले 1000 टन माल के लिए आर्डर करते थे अब वह 200 टन माल के लिए आर्डर कर रहे हैं ऐसे में इसका सीधा असर भारत के बासमती व्यापार पर पड़ रहा है। इस अंधकारमय स्थिति में भारत सरकार का हस्तक्षेप चावल उद्योग के लिए एक बड़ी उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। सरकार ने जिन राहत उपायों का खाका खींचा है, वे इस प्रकार हैं।
संजय गुप्ता जैसे अनुभवी व्यापारियों का मानना है कि इस संकट का कोई तुरंत समाधान नहीं है। यदि आज भी युद्ध विराम की घोषणा हो जाए, तो भी बिगड़े हुए लॉजिस्टिक्स, जहाजों के रूट और अटके हुए भुगतानों को पटरी पर लौटने में कम से कम 2 साल का समय लगेगा। तब तक हालात और भी ज्यादा बिगड़ सकते हैं।
Also Read
मेष: दिन शुभ रहेगा...