Village Library First Laboratory Of Developed India : किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति केवल बड़े शहरों की चमक-दमक से नहीं, बल्कि गांवों तक ज्ञान और अवसरों की पहुंच से मापी जाती है। जब ग्रामीण युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक संसाधन और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर वातावरण अपने ही गांव में उपलब्ध हो, तब विकास की अवधारणा वास्तव में सार्थक बनती है।
हरियाणा ने इसी सोच को साकार करते हुए ‘अटल ई-पुस्तकालय’ अभियान के माध्यम से शिक्षा और डिजिटल सशक्तीकरण का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है। राज्य के 985 से अधिक गांवों में स्थापित ये आधुनिक पुस्तकालय केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों, आकांक्षाओं और उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव बनकर उभरे हैं। यहां नवीनतम पुस्तकें, डिजिटल अध्ययन-सुविधाएं, तीव्रगति इंटरनेट, शांत वातानुकूलित वातावरण और एकाग्र अध्ययन का अनुकूल परिवेश उपलब्ध है। परिणामस्वरूप गांव का युवा अब अपने ही गांव से प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस सेवा, बैंक, कर्मचारी चयन आयोग, शिक्षक भर्ती तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पूरे आत्मविश्वास के साथ कर रहा है। इस पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल पुस्तकालयों का निर्माण नहीं, बल्कि उस धारणा को बदलना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल शहरों की पहचान है।
वर्षों तक बेहतर संसाधनों की तलाश में ग्रामीण विद्यार्थियों को घर छोड़ना पड़ता था और शिक्षा परिवार पर आर्थिक बोझ बन जाती थी। हरियाणा ने यह स्थिति बदल दी है। अब गांव का विद्यार्थी अपने ही गांव में डिजिटल संसाधनों, राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन अभ्यास परीक्षाओं और नवीनतम अध्ययन सामग्री का लाभ उठाकर बिना पलायन अपने भविष्य की मजबूत नींव रख रहा है। यह केवल सुविधा का विस्तार नहीं, बल्कि शिक्षा के भूगोल में ऐतिहासिक परिवर्तन है। इसने सिद्ध कर दिया है कि प्रतिभा का भविष्य स्थान नहीं, अवसर तय करते हैं।इन पुस्तकालयों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने अध्ययन को व्यक्तिगत संघर्ष से सामूहिक शक्ति में बदल दिया है। गांव के युवा यहां साथ बैठकर तैयारी करते हैं, समसामयिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं, एक-दूसरे की शंकाओं का समाधान करते हैं और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनाते हैं।
डिजिटल पुस्तकालय और तीव्रगति इंटरनेट उन्हें विश्वस्तरीय ज्ञान, नवीनतम अध्ययन सामग्री तथा बदलते परीक्षा-पैटर्न से निरंतर जोड़ते हैं। जिन सुविधाओं के लिए कभी बड़े शहरों की महंगी कोचिंग और किराए के कमरों पर निर्भर होना पड़ता था, वे आज गांव में ही उपलब्ध हैं। इससे समय और धन दोनों की बचत हो रही है, साथ ही परिवार और समाज से जुड़ाव भी बना हुआ है। आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना का सबसे सशक्त और जीवंत स्वरूप आज हरियाणा के इन ग्रामीण पुस्तकालयों में दिखाई देता है। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जमीनी भागीदारी है। पुस्तकालयों का संचालन केवल सरकारी तंत्र नहीं, बल्कि ग्राम पंचायतों की सक्रिय सहभागिता से हो रहा है। इसलिए प्रत्येक पुस्तकालय स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुआ है। जहां कृषि संबंधी प्रतियोगी परीक्षाओं की मांग है, वहां उसी अनुरूप अध्ययन सामग्री है; जहां सरकारी नौकरियों की तैयारी प्रमुख है, वहां आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं।
यह ऊपर से थोपा गया मॉडल नहीं, बल्कि गांव की जरूरतों से निर्मित व्यवस्था है। इसलिए युवा इन पुस्तकालयों को केवल सरकारी भवन नहीं, बल्कि अपने भविष्य और गांव की सामूहिक पूंजी मानते हैं। यही स्वामित्व-बोध किसी भी जनकल्याणकारी योजना की स्थायी सफलता का आधार बनता है। शिक्षा विशेषज्ञ इस पहल को उचित ही ‘ज्ञान का लोकतंत्रीकरण’ कहते हैं। जब ज्ञान पर आर्थिक संसाधनों का एकाधिकार टूटता है, तभी सामाजिक न्याय का वास्तविक मार्ग प्रशस्त होता है। आज किसान का बेटा और मजदूर की बेटी भी उसी स्तर की तैयारी कर रहे हैं, जिसके लिए कभी महंगी कोचिंग और शहर में रहना अनिवार्य माना जाता था। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं में ग्रामीण युवाओं की भागीदारी और प्रशासनिक सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। मेरिट का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि प्रतिभा बनेगी। शिक्षा की यह समानता सामाजिक विषमताओं को भी कम करेगी। विकास तभी स्थायी होता है, जब उसकी धारा नीचे से ऊपर बहे।
हरियाणा ने इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारकर दिखाया है। अब प्रश्न केवल हरियाणा की सफलता का नहीं, बल्कि देश की विकास-प्राथमिकताओं का है। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में आज भी लाखों युवा बेहतर अध्ययन-संसाधनों के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं। यदि प्रत्येक पंचायत में आधुनिक ई-पुस्तकालय स्थापित किए जाएं, तो यह केवल शिक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक समरसता और रोजगार के नए अवसरों का भी आधार बन सकता है। केंद्र सरकार को डिजिटल इंडिया, कौशल विकास और ग्रामीण विकास की योजनाओं से इस मॉडल को जोड़कर राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप देना चाहिए। जिस प्रकार डिजिटल भुगतान और ग्रामीण इंटरनेट ने भारत की कार्यसंस्कृति बदली है, उसी प्रकार ज्ञान तक समान पहुंच का यह अभियान शिक्षा के परिदृश्य को नई दिशा दे सकता है। अब हर पंचायत में आधुनिक पुस्तकालय का सपना कल्पना नहीं, बल्कि एक सिद्ध, व्यवहारिक और राष्ट्रीय स्तर पर अपनाए जाने योग्य मॉडल है। हरियाणा की यह पुस्तकालय क्रांति एक गहरी सीख देती है—राष्ट्र केवल राजधानी की ऊंची इमारतों से नहीं, गांवों के अध्ययन-कक्षों से भी बनता है।
किसी ग्रामीण पुस्तकालय में देर रात तक जलती रोशनी, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटे युवा की आंखों का आत्मविश्वास और अपने ही गांव में भविष्य गढ़ने का संकल्प—यही लोकतांत्रिक विकास का सबसे प्रेरक दृश्य है। यह पहल केवल सरकारी नौकरियों की तैयारी का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वाभिमान, सामाजिक समानता और अवसरों के विकेंद्रीकरण का सशक्त प्रतीक है। हरियाणा ने सिद्ध कर दिया है कि जब शिक्षा गांव के द्वार तक पहुंचती है, तब केवल विद्यार्थियों का भविष्य नहीं, पूरे समाज की दिशा बदल जाती है। अब समय है कि अन्य राज्य भी इस पथ पर आगे बढ़ें। क्योंकि जिस दिन भारत के हर गांव में ज्ञान का दीप समान रूप से प्रज्वलित होगा, उसी दिन विकास का वास्तविक सूर्योदय होगा। सच तो यह है कि जब गांव जागते हैं, तभी राष्ट्र आगे बढ़ता है।
-प्रो. आरके जैन
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