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2024 के बाद बदली सियासत: महिला वोटर बनीं असली ‘किंगमेकर’

Women voters become real 'kingmakers'

Women voters become real 'kingmakers'

नई दिल्ली: कहा जाता है कि हर एक दशक और आधे दशक में हर एक क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है, बात चाहे तकनीक की हो या फिर राजनीति की। 2024 के आम चुनावों के बाद से भारत की राजनीतिक बिसात पर महिला वोटर्स की संख्या में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली और ये आंकड़े हर विधानसभा चुनाव में बढ़ते ही जा रहे हैं।

भारतीय राजनीति में ‘आधी आबादी’ अब केवल चुनाव प्रचार का हिस्सा नहीं है बल्कि ‘किंगमेकर’ बन चुकी है, जिसके इर्द-गिर्द हर राजनीतिक दल का चुनावी घोषणापत्र तैयार हो रहा है। 2024 के पहले के चुनावों में सिर्फ युवाओं को केंद्र में रखकर राजनीतिक पार्टियां घोषणापत्र तैयार करती थीं। हालांकि 2024 के बाद से राजनीतिक पार्टियों ने युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को भी केंद्र में रखना शुरू किया। महिला केंद्रित बहुत सारी योजनाओं को लागू किया गया, जिसका असर ये हुआ कि महिला मतदाताओं की संख्या हर चुनाव में बढ़ती नजर आई।

महिला वोटरों की भागीदारी अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर

चुनाव आयोग और एसबीआई रिसर्च विभाग के हालिया प्रामाणिक आंकड़े बताते हैं कि महिला वोटरों की भागीदारी अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर है और इसके पीछे सरकार की ‘महिला-केंद्रित’ कल्याणकारी योजनाओं का सबसे बड़ा असर है।

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2024 के लोकसभा चुनावों में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बना

2024 के लोकसभा चुनावों में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बना, जब महिला मतदाताओं का टर्नआउट (65.78 प्रतिशत) पुरुष मतदाताओं (65.55 प्रतिशत) से आगे निकल गया। इस चुनाव में लगभग 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया जो इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह लहर लोकसभा तक ही सीमित नहीं रही। 2024 के अंत में हुए विधानसभा चुनावों में इस ट्रेंड ने और भी मजबूत रूप ले लिया। झारखंड विधानसभा चुनाव (2024) में चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पहले चरण में ही 69.04 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया जबकि पुरुषों का प्रतिशत 64.27 प्रतिशत ही रहा। 43 में से 37 सीटों पर महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से अधिक था। महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जहां-जहां महिलाओं के लिए सीधी नकद हस्तांतरण योजनाएं लागू थीं, वहां महिला मतदान प्रतिशत में अभूतपूर्व उछाल देखा गया।

2025 में बिहार चुनावों में भी यहीं ट्रेंड देखने को मिला

2025 के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में भी यहीं ट्रेंड देखने को मिला। यहां भी बिहार सरकार की ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ कारगर साबित हुई। इस योजना के तहत रोजगार की शुरुआत करने के लिए 10,000 हजार रुपए की सहायता राशि दी गई। इस योजना के तहत कुछ मामलों में बेहतर प्रदर्शन पर 2 लाख रुपए तक की सहायता राशि देने का प्रावधान है। इसका असर ऐसा हुआ कि बिहार में भी महिलाओं ने रिकॉर्डतोड़ वोटिंग की। महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6 था जबकि पुरुषों का मतदान प्रतिशत 62.8 रहा। महिलाओं ने पुरुषों से करीब 9 प्रतिशत ज्यादा मतदान किया था।

यही ट्रेंड 9 अप्रैल 2026 को भी देखने को मिल रहा 

अब यही ट्रेंड 9 अप्रैल को हो रहे विधानसभा चुनावों में देखने को मिल रहा है। चाहे बात असम चुनाव की हो या केरल की या फिर पुडुचेरी की। हर जगह महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। एसबीआई की जनवरी 2025 की विस्तृत रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के मुकाबले 2024 और उसके बाद के चुनावों में महिलाओं के मतदान प्रतिशत में भारी वृद्धि कोई संयोग नहीं है। इसके पीछे जमीनी स्तर पर काम करने वाली सरकारी योजनाएं हैं।

राज्यों में ‘माझी लड़की बहिण योजना’ (महाराष्ट्र) या ‘मंईयां सम्मान योजना’ (झारखंड) जैसी योजनाओं ने महिलाओं के हाथ में सीधे पैसा पहुंचाया है। जब महिलाओं को बिना किसी बिचौलिए या परिवार के पुरुष सदस्य पर निर्भर हुए सीधे आर्थिक मदद मिलती है, तो उनका सत्ता के प्रति विश्वास बढ़ता है और वे वोट देने के लिए ज्यादा प्रेरित होती हैं। बढ़ी हुई महिला वोटिंग में एक बड़ा हिस्सा उन महिलाओं का है, जिन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घरों का मालिकाना हक मिला है। संपत्ति पर नाम होने से महिलाओं में सामाजिक सुरक्षा और सशक्तीकरण की भावना पैदा हुई है।

स्वच्छ भारत अभियान के तहत बने शौचालय और ‘हर घर जल’ योजना ने महिलाओं के जीवन की सबसे बड़ी रोजमर्रा की चुनौतियों को कम किया है। घर में नल और बिजली जैसी सुविधाओं ने महिलाओं के जीवन स्तर को सुधारा है जिसका सीधा असर पोलिंग बूथ पर उनके बढ़े हुए टर्नआउट के रूप में दिखा है।

‘चुनाव जाति या धर्म के पुराने समीकरणों से नहीं, ‘जेंडर पॉलिटिक्स’ से जीते जा रहे’

स्वयं सहायता समूहों की मजबूती और मुद्रा योजना के तहत आसान लोन मिलने से लाखों महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं। लगभग 36 लाख अतिरिक्त महिला वोटर इसी श्रेणी से जुड़ी पाई गई हैं। इस डेटा ने राजनीतिक दलों को यह साफ संदेश दे दिया है कि अब चुनाव जाति या धर्म के पुराने समीकरणों से नहीं बल्कि ‘जेंडर पॉलिटिक्स’ से जीते जा रहे हैं। अब हर पार्टी यह समझ चुकी है कि महिला वोटर एक स्वतंत्र वोट बैंक है। वे अब अपने पति या पिता के कहने पर वोट नहीं देतीं बल्कि उस पार्टी को चुनती हैं जो उनकी सुरक्षा, सम्मान और रसोई के बजट को सीधे तौर पर सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

2024 और उसके बाद के चुनाव इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि भारतीय लोकतंत्र में अब नीतियां महिलाओं को ध्यान में रखकर ही बनेंगी। इसका एक ताजा उदाहरण महिला आरक्षण बिल भी दिख रहा है, जो आने वाले समय में संसद में रखा जाएगा। इसके तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत तक का आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं ने न केवल उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त किया है बल्कि उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत और निर्णायक आवाज भी बना दिया है।

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