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पंजाब में पराली जलाने के मामलों में 50% की कमी, फिर भी दिल्ली में धुआं क्यों?

पंजाब डेस्क: दिल्ली की ख़राब हवा को लेकर बहस के बीच पंजाब से इस बार एक नया ट्रेंड सामने आया है। बता दें कि राज्य में पराली जलाने के मामलों में पिछले एक सप्ताह में काफी तेज़ गिरावट देखी गई है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले आठ दिनों में केवल 384 घटनाएं रिपोर्ट हुईं और यह संख्या लगातार सिंगल व डबल डिजिट में सिमट रही है। 19 नवंबर को तो पूरे राज्य में सिर्फ 12 नए मामले दर्ज किए गए।

पिछले साल की तुलना में लगभग 50% कमी

इस वर्ष अब तक कुल 5,046 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जबकि वर्ष 2024 के इसी अवधि में यह संख्या 10,104 थी। यानी मुद्दे पर लंबी आलोचना और राजनीतिक आरोपों के बीच पंजाब में पराली को लेकर करीब 50 प्रतिशत कमी आई है।

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ पर्यावरण इंजीनियर राजीव गुप्ता का कहना है कि अब तक ऐसी कोई वैज्ञानिक स्टडी नहीं है, जो यह पूरी तरह साबित करे कि पंजाब की पराली सीधे तौर पर दिल्ली के प्रदूषण को गंभीर स्तर तक पहुंचाती है।

कौन-सा जिला सबसे आगे?

राज्य के जिन जिलों में पराली जलाने की घटनाएं अभी भी अधिक हैं, उनमें संगरूर (695) और तरनतारन (693) शीर्ष पर हैं। इनके बाद फिरोज़पुर, अमृतसर, बठिंडा, मुक्तसर और मानसा जैसे जिले आते हैं। होशियारपुर, SAS नगर और फतेहगढ़ साहिब में मामलों की संख्या तुलनात्मक रूप से बेहद कम है।

जुर्माने और कार्रवाई तेज़

पराली जलाने पर नकेल कसने के लिए प्रशासन ने सख्ती भी बढ़ाई है।
अब तक ₹1.22 करोड़ का जुर्माना लगाया जा चुका है।
इसमें से ₹60.55 लाख वसूले भी जा चुके हैं।
1,890 FIR दर्ज हुई हैं और 2,138 छापेमारी अभियान चलाए गए हैं।

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पंजाब की हवा सुधरी, दिल्ली में क्यों नहीं?

विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने में कमी का असर पंजाब के शहरों में साफ दिखाई दे रहा है, जहां AQI अब ‘मॉडरेट’ श्रेणी में पहुंच गया है। इसके विपरीत, दिल्ली में हवा की गुणवत्ता लगातार ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में फंसी हुई है। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या दिल्ली की ज़हरीली हवा के लिए पंजाब को ही मुख्य तौर पर दोष देना उचित है, या राजधानी के अपने स्थानीय प्रदूषण स्रोत कहीं अधिक ज़िम्मेदार हैं?

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