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मन को इंद्रियों का स्वामी माना गया है। मन के भावों का तथा विचारों का प्रभाव शरीर और आत्मा तथा संपर्क में आने वाले प्राणी मात्र पर पड़ता है। अज्ञान, अविद्या तथा तामसिक वृतियां मन की एकाग्रता को भंग करके उसे संशयग्रस्त बना देती हैं। संशय हमारे मन की पवित्रता में बाधक माना गया है।.