Sambhal violence case: उत्तर प्रदेश के संभल जिले से जुड़े हिंसा मामले में न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। शाही जामा मस्जिद बवाल से जुड़े कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने वाले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर का तबादला कर दिया गया है। उन्हें अब सुल्तानपुर में सिविल जज (सीनियर डिविजन) के पद पर तैनात किया गया है। खास बात यह है कि यह तबादला पदावनति के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उन्हें CJM पद से हटाया गया है।
FIR के आदेश के बाद बदला घटनाक्रम
संभल जिला पहले से ही संवेदनशील मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। शाही जामा मस्जिद से जुड़े विवाद में CJM कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, थाना प्रभारी अनुज तोमर समेत कुल 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए सात दिन के भीतर रिपोर्ट भी मांगी थी। इस आदेश के बाद मामला केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे अदालत और पुलिस के बीच टकराव के रूप में देखा जाने लगा।
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पुलिस का पलटवार, FIR से इनकार
कोर्ट के आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार ने साफ कहा था कि इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। उन्होंने दावा किया था कि घटना की न्यायिक जांच पहले ही हो चुकी है और पुलिस अदालत के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देगी। इसके बाद यह सवाल उठने लगे कि क्या जिले में अदालत के आदेशों की अवहेलना हो रही है।
पीड़ित का आरोप: पुलिस ने दर्ज नहीं की FIR
मामले के शिकायतकर्ता का आरोप है कि घटना के बाद पुलिस ने उनके बेटे को ही आरोपी बना दिया और एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया। डर और दबाव के चलते घायल बेटे का इलाज उन्होंने छुपकर मेरठ में कराया। जब मामला अदालत पहुंचा, तब जाकर पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े हुए।
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क्या है पूरा मामला
शिकायत के अनुसार, नखासा थाना क्षेत्र के खग्गू सराय निवासी यामीन ने आरोप लगाया कि उनका 24 वर्षीय बेटा आलम 24 नवंबर 2024 को पापड़ बेचने निकला था। शाही जामा मस्जिद के पास पुलिस ने कथित तौर पर उसे गोली मार दी। इस मामले में यामीन ने तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, थाना प्रभारी अनुज तोमर और 10–12 अन्य पुलिसकर्मियों को नामजद आरोपी बनाया था।
तबादले के बाद उठे सवाल
CJM विभांशु सुधीर के तबादले के बाद अब यह बहस और तेज हो गई है कि क्या यह फैसला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर एक संवेदनशील आदेश का नतीजा। संभल में अदालत और पुलिस के बीच बढ़ता तनाव न्यायिक स्वतंत्रता और कानून के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

