Last Updated: September 23, 2026

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मातृ दिवस पर विशेष : मां : थकती जरूर है, मगर हारती कभी नहीं

May 8, 2026

मातृ दिवस पर विशेष : मां : थकती जरूर है, मगर हारती कभी नहीं

ऐ अंधेरे देख ले, मुंह तेरा काला हो गया। मां ने आंखें खोली घर में उजाला हो गया। जी, हां मशहूर शायर मुनव्वर राणा की ये लाइनें हम सब के जीवन सटीक साबित होती हैं। आज 10 मई को मातृ दिवस हो और बात मुनव्वर राणा की रचना मां के जिक्र के बिना समाप्त हो जाए। ऐसा नहीं हो सकता।

हर तूफान समेट लेती है मां

जब जीवन पहली बार ममता की छाया में सांस लेना सीखता है, तभी मां का अर्थ समझ आता है। मई के दूसरे रविवार पर आने वाला यह दिन मां के निस्वार्थ प्रेम और अथाह त्याग का वह उजाला है, जिसमें हमारे अस्तित्व का सच्चा अर्थ साफ दिखाई देता है। भारत समेत अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में मई के दूसरे रविवार को मनाया जाने वाला मदर्स डे (मातृ दिवस) औपचारिक नहीं, उस मूल शक्ति का सम्मान है जो हर जीवन की नींव है। मां वह दीप है, जो स्वयं जलकर अंधकार हरती है, और वह आसमान है, जो हर तूफान समेट लेता है।

गर्भ में हलचल से आता है बदलाव

सूरज बाद में उगता है, पर मां का स्नेह पहले ही रास्ता दिखा देता है। इसलिए यह दिन किसी रिश्ते का नहीं, उस दिव्यता का उत्सव है, जिसमें सृजन, संरक्षण और समर्पण एक साथ बसते हैं। जहां शब्द रुक जाते हैं और समझ की सीमाएँ छोटी पड़ जाती हैं, वहीं मां के प्रेम की असली गहराई शुरू होती है। विज्ञान भले बहुत आगे बढ़ जाए, पर इस अनुभूति को पूरी तरह समझ नहीं पाता। गर्भ में शिशु की पहली हलचल के साथ ही मां के तन-मन में अद्भुत बदलाव आते हैं।

आत्मा का स्पंदन भी होती है मां

ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन उसे पीड़ा सहने की शक्ति देते हैं, पर यह सिर्फ शरीर का विज्ञान नहीं, आत्मा का स्पंदन है। रात-रात जागकर बच्चे की देखभाल करना, अपने हिस्से का भोजन त्याग देना—ये सामान्य नहीं, प्रेम की चरम अभिव्यक्ति हैं। भारतीय परंपरा में ‘माता’ वही है जो सहेजती है, संरक्षण देती है और स्वयं को समर्पित कर देती है। रामायण की कौशल्या से महाभारत की कुंती तक और आज की हर मां तक, यह त्याग और समर्पण की धारा अनवरत बहती रही है।

मां का इतिहास नहीं अमर सत्य है वह

जब प्रेम अपनी अंतिम सीमा पार कर त्याग में ढल जाता है, तब मां की ममता इतिहास नहीं, अमर सत्य बन जाती है। 1952 के कोरिया युद्ध की वह घटना आज भी संवेदनाओं को झकझोर देती है, जब एक मां ने अपने नवजात को ठंड से बचाने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। बर्फ से जमे पुल के नीचे जन्मे उस शिशु को जीवित रखने के लिए उसने अपने शरीर की आखिरी गर्मी तक उसे ओढ़ा दी। वर्षों बाद जब उस बेटे को यह सच्चाई पता चली, तो उसकी पीड़ा हर संवेदनशील मन में गूंज उठी। यह कोई कथा नहीं, मातृत्व का वह कठोर सच है, जहाँ मां खुद मिटकर भी जीवन बचा लेती है। इसलिए मां की कोई तुलना संभव नहीं — वह हर उपमा से परे है।

सपने पूरे करना ही मां की पहचान

जब बाहरी जगमगाहट बढ़ती है और भीतर की गर्माहट कम होने लगती है, तब मां का मौन संघर्ष और गहरा हो जाता है। वह घर की सीमाओं से परे, समय और समाज के हर दबाव से लड़ते हुए बच्चों का भविष्य गढ़ती है। कभी अपने सपनों और करियर को पीछे रखकर, तो कभी बीमारी में भी मुस्कान के साथ वह हर जिम्मेदारी निभाती है। कठिन परिस्थितियों में भी बच्चों की सुरक्षा उसका अडिग संकल्प रहता है। वर्षों की मेहनत से उन्हें सफलता दिलाना और अपनी पीड़ा छुपाकर उनके सपने पूरे करना—यही मां की पहचान है। वह सच में ऐसी योद्धा है, जो बिना हथियार हर लड़ाई जीत लेती है।

आधुनिकता से होता है मां का अर्थ धुंधला

जब भावनाएँ बाज़ार की चमक में सिमटती हैं, तब मातृ-दिवस का अर्थ धुंधला पड़ जाता है। समय के साथ यह अवसर उपहारों, कार्डों और औपचारिकताओं तक सीमित हो गया है, जबकि इसकी आत्मा कहीं गहरी है। मातृ-दिवस की पहल करने वाली अन्ना जार्विस ने इसके व्यावसायीकरण पर खेद जताया था। उनका मानना था कि मां के प्रति सच्चा सम्मान एक दिन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार में झलकता है। मां के साथ बिताए गए सच्चे पल, उसकी बातों को ध्यान से सुनना और उसकी भावनाओं को समझना ही वास्तविक श्रद्धांजलि है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि मां के प्रति कृतज्ञता कोई क्षणिक भावना नहीं, बल्कि जीवनभर निभाया जाने वाला भाव है।

भविष्य की दिशा तय करती है मां

जहां से भविष्य की दिशा तय होती है, वहाँ मां की छाप सबसे गहरी होती है। वह सिर्फ परिवार की धुरी नहीं, बल्कि राष्ट्र की असली नींव है। एक शिक्षित और जागरूक मां अपने बच्चों के साथ समाज को भी सही राह दिखाती है। खेतों से शहरों तक, अनगिनत माताएँ बिना वेतन और बिना विश्राम निरंतर राष्ट्र निर्माण में लगी हैं। उनका परिश्रम भले मौन हो, पर उसका प्रभाव असीम है। जब मां अपनी बेटी को शिक्षित करती है, तो वह एक नहीं, कई पीढ़ियों को सशक्त बना देती है। इसलिए मां की भूमिका इतनी विशाल है कि उसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना संभव नहीं।

कर्त्तव्यों को पहचानने का दिन है आज

जब कृतज्ञता शब्दों से आगे बढ़कर संकल्प बन जाती है, तभी मातृ-दिवस का अर्थ पूर्ण होता है। 10 मई 2026 हमें केवल उत्सव नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को पहचानने का अवसर देता है। मां के लिए एक स्नेहभरा फोन, उसके साथ बिताया गया थोड़ा-सा समय या एक सच्ची मुस्कान — ये छोटे कदम उसके जीवन में गहरी खुशी भर देते हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि उसके चेहरे की मुस्कान कभी फीकी न पड़े और उसकी आँखों में आँसू न आएँ। क्योंकि मां की प्रसन्नता ही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है, और उसकी संतुष्टि से बड़ा कोई पुरस्कार नहीं।

सत्य की तरह अडिग है मां का रिश्ता

जब हर रिश्ता समय के साथ बदलता है, तब भी एक सत्य अडिग रहता है — माँ। उसका प्रेम वह सूक्ष्म धागा है, जो टूटे सपनों को फिर से जोड़ देता है और बिखरे जीवन को संवार देता है। 10 मई 2026 का यह मातृ-दिवस हमें याद दिलाता है कि हम उसी के अंश हैं, उसके त्याग और स्नेह का विस्तार हैं; उसके बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है। इसलिए यह दिन केवल स्मरण का नहीं, संकल्प का है — उसके आदर्शों पर चलने का, उसके त्याग का सम्मान करने का और उसके प्रेम को जीवन का मार्ग बनाने का। जय माता दी — हर उस मां के लिए, जो न थकती है, न हारती है, और सदैव अपने बच्चों के लिए दीपक बनकर जलती रहती है।
-कृति आरके जैन

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