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दूर करें कन्फ्यूजन… जानें 17 या 18 कब से शुरू हाे रहे पितृपक्ष

September 16, 2024

दूर करें कन्फ्यूजन… जानें 17 या 18 कब से शुरू हाे रहे पितृपक्ष

प्रयागराज : पितरों की आत्मा की मुक्ति और शांति के लिए भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से आरम्भ होकर आश्विन मास में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक एक पखवाड़े तक चलने वाला पितृपक्ष मंगलवार से शुरू हो रहा है। भाद्र पक्ष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से आरम्भ होकर आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक चलने वाला एक पखवाड़े का पितृपक्ष मंगलवार 17 सितंबर की सुबह 11 बजे लगकर अगले दिन 18 सितंबर की सुबह 8.41 बजे तक रहेगी। इसमें उदया तिथि नहीं मानी जाती। इसलिए 17 सितंबर को पूर्णिमा एवं 18 सितंबर को प्रतिपदा का श्राद्ध किया जाएगा।

एक पखवाड़े तक चलने वाले श्रद्ध तिथियों में मुख्य 18 सितंबर को प्रतिपदा तिथि को पड़वा श्राद्ध, 26 सितंबर को मातृ नवमी को मां का श्राद्ध, 29 सितंबर द्वादशी का तिथि को संन्यासियों का, एक अक्टूबर चतुर्दशी तिथि पर अस्त्र-शस्त्र या अकाल मौत वालों का श्राद्ध और 2 अक्टूबर को अमावस्या का श्राद्ध किया जाता है।सनातन धर्म में पितरों की आत्मशंति और मोक्ष प्राप्ति के लिए पितृ पक्ष का समय महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस महीनें में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितरों को मोक्ष मिलता है। मान्यता है कि श्राद्ध कर्म करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और वंश वृद्धि का आशीष प्राप्त होता है। हर साल पितृपक्ष में पूर्वज पितृलोक से धरती लोक पर आते हैं और श्राद्ध मिलने पर प्रसन्न होकर स्वस्थ, चिरंजीवी, धनधान्यपूर्ण और परिवार के मंगल का आशीर्वाद देकर पितृ लोक को वापस जाते हैं।

हिन्दू अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिए पिण्ड दान करते हैं। इसे ‘सोलह श्राद्ध‘,‘महालय पक्ष‘,‘अपर पक्ष’ आदि नामों से भी जाना जाता है। स्मृतियों एवं पुराणों में भी आत्मासंसरण संबंधी विश्वास पाए जाते हैं और इनमें भी पितृर्पण के लिए श्रद्ध संस्कारों की महत्ता परिलक्षित होती है। मृत्युपरांत पितृ कल्याण-हेतु पहले दिन दस दान और अगले दस ग्यारह दिन तक अन्य दान दिए जाने चाहिए। इन्हीं दान की सहायता से मृतात्मा नई काया धारण करती है और अपने कर्मानुसार पुनरावृत्त होती है।

पिंडदान की परंपरा केवल प्रयाग, काशी और गया में है, लेकिन पितरों के पिंडदान और श्राद्ध कर्म की शुरुआत प्रयाग में क्षौर कर्म से होती है। पितृपक्ष में हर साल बड़ी संख्या में लोग देश के कोने कोने से पिंण्ड दान के लिए संगम आते हैं। पितृ मुक्ति का प्रथम एवं मुख्य द्वार कहे जाने के कारण संगमनगरी में पिंडदान और श्रद्ध कर्म का विशेष महत्व है। धर्म शास्त्रों में भगवान विष्णु को मोक्ष के देवता माना जाता है। प्रयाग में भगवान विष्णु बारह भिन्न रूपों में विराजमान हैं। मान्यता है कि त्रिवेणी में भगवान विष्णु बाल मुकुंद स्वरूप में वास करते हैं। प्रयाग को पितृ मुक्ति का पहला और मुख्य द्वार माना जाता है। काशी को मध्य और गया को अंतिम द्वार कहा जाता है। प्रयाग में श्राद्ध कर्म का आरंभ मुंडन संस्कार से होता है।

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