नेशनल डेस्क : जब पसीने से सींची फसल का दाम पानी से भी सस्ता मिले, तो किसान आखिर जाए तो कहां जाए ? कर्नाटक के विजयपुरा जिले से सामने आई एक तस्वीर ने देश की कृषि व्यवस्था की हकीकत को उजागर कर दिया है। यह सिर्फ एक किसान का गुस्सा या विरोध नहीं था, बल्कि पूरे सिस्टम के खिलाफ एक बेबस चीख थी। उस किसान का प्याज की बोरी को सड़क पर उलटना और खुद उसी में लोट जाना, हमारे समाज की संवेदनहीनता का आईना था। यह सवाल आज हर भारतीय से पूछा जाना चाहिए। क्या हमारा किसान खुश है ? क्या वो अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पा रहा है ? क्या उसके बच्चे स्कूल जा रहे हैं, या वो भी खेतों में उसके साथ मजदूरी कर रहे हैं? विजयपुरा के उस किसान की हालत देखकर यह साफ है कि जवाब “नहीं” है।
कंपनियों को आजादी, किसानों को मजबूरी
आपको बता दें कि जब आप बाजार में किसी भी कंपनी का सामान खरीदते हैं चाहे वो साबुन हो, नमकीन हो या एक बोतल पानी तो उस पर दाम पहले से तय होता है। कंपनी को पूरा अधिकार है कि वो अपने उत्पाद की लागत, मुनाफा और अन्य खर्च जोड़कर एक उचित मूल्य तय करे। पर क्या हमारे देश के अन्नदाता को भी ऐसा ही अधिकार मिला है ? 77 साल की आजादी के बाद भी किसान को अपनी उपज का दाम खुद तय करने की आजादी नहीं है। उसके लिए न कोई गारंटी है, न स्थिरता। उसे मंडियों में जाना पड़ता है, नीलामी में फसल बेचनी होती है, और जब दाम 200 रुपये क्विंटल जैसा अपमानजनक स्तर पर गिरते हैं, तो वह अपने आंसुओं के साथ अपनी मेहनत को बहते हुए देखता है।
प्याज का दाम सुन, किसान का टूटा दिल
कर्नाटक के विजयपुरा जिले के रोनिहाल गांव का एक किसान अच्छी क्वालिटी की प्याज लेकर नीलामी में पहुंचा था। उसे उम्मीद थी कि उसकी मेहनत की कम से कम 800 से 1,000 रुपये प्रति क्विंटल कीमत तो मिलेगी ही। लेकिन जब बोली 200 रुपये प्रति क्विंटल लगी, तो जैसे उसका दिल टूट गया। निराश किसान ने अपनी प्याज की बोरी सड़क पर पलट दी और खुद उसी प्याज पर लोटकर विरोध जताने लगा। यह दृश्य न सिर्फ उसकी बेबसी दिखाता है, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक गहरा सवाल भी खड़ा करता है: क्या भारत में किसानों की मेहनत की कोई कीमत नहीं है?
ना बारिश साथ देती, ना बाजार
ऐसे हालात सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं हैं। कुछ दिन पहले महाराष्ट्र में भी एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक किसान अपनी मूंगफली की फसल को मंडी में बेचने पहुंचा था। लेकिन तेज बारिश ने उसकी आंखों के सामने ही सारी मेहनत बहा दी। किसान रोते हुए अपनी फसल समेटने की कोशिश करता रहा, लेकिन कुछ बचा न सका।
क्या है इसका समाधान?
-न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की अनिवार्यता पर दोबारा मंथन जरूरी है।
-फसल बीमा योजनाएं, किसानों तक सही तरीके से पहुँचें और प्रभावी ढंग से लागू हों।
-मंडी सुधार, जहां किसान को सीधे उचित मूल्य मिल सके।
-स्ट्रॉरेज और प्रोसेसिंग सुविधाएं, जिससे किसान तुरंत बाजार में बेचने के लिए मजबूर न हो।
एक सवाल जो हम सबको पूछना चाहिए
जब हम बाजार में एक किलो प्याज खरीदते हैं, तो उसका दाम सुनकर भौंहे चढ़ा लेते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि उस प्याज को उगाने वाला किसान कितना कमाकर घर लौट रहा है? क्या वह अपने बच्चों के स्कूल की फीस भर पा रहा है? क्या वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी दे पा रहा है? देश का अन्नदाता आज खुद भूखा है, उसकी फसल सड़कों पर बिखर रही है और उसका गुस्सा अब लाचार विरोध बनकर उभर रहा है। अगर आज भी हमने उसकी आवाज़ नहीं सुनी, तो कल हमारे थालियों में सिर्फ खाना नहीं, संवेदनहीनता का स्वाद भी होगा।
मेष: दिन शुभ रहेगा...