
नई दिल्ली: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उन्होंने अपने खिलाफ चल रही महाभियोग (Impeachment) की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को गलत और असंवैधानिक बताया है। यह मामला 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने और वहां से जली हुई नकदी मिलने के बाद शुरू हुआ था।
14 मार्च को दिल्ली के लुटियंस इलाके में स्थित उनके घर में आग लग गई थी। दमकल विभाग ने आग बुझाते समय वहां से काफी मात्रा में अधजली नकदी बरामद की थी। उस समय वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीश थे और घर पर मौजूद नहीं थे।
इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना ने तीन जजों की आंतरिक समिति बनाई थी। समिति में न्यायमूर्ति शील नागू, न्यायमूर्ति जीएस संधावालिया और न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल थे। समिति ने 3 मई को रिपोर्ट सौंप दी और इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने 8 मई को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने की सिफारिश की।
वर्मा का कहना है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया। उन्हें जांच से जुड़ी कोई जानकारी या सबूत नहीं दिए गए, न ही सीसीटीवी फुटेज तक पहुँच मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि समिति ने पूर्व-निर्धारित सोच के साथ काम किया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया। याचिका में यह भी कहा गया है कि कोई औपचारिक शिकायत न होने के बावजूद कार्रवाई शुरू की गई।
8 मई के पत्र को असंवैधानिक घोषित किया जाए। 3 मई की समिति रिपोर्ट और उसके आधार पर की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाए। आंतरिक समिति की प्रक्रिया को “अनुचित और अवैध” करार दिया जाए। न्यायपालिका को ऐसी सिफारिश करने का अधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि यह संसद का क्षेत्राधिकार है।
याचिका में कहा गया है कि किसी न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया केवल संसद के माध्यम से ही हो सकती है, जैसा कि अनुच्छेद 124 और 218 और न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 में तय है। इस तरह की आंतरिक प्रक्रिया संसदीय प्रक्रिया में हस्तक्षेप है और यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है।
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