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शारदीय नवरात्रि में इन शक्तिपीठों पर जरूर लगाएं हाजिरी, पूरी होगी हर मनोकामना!

September 30, 2025

शारदीय नवरात्रि में इन शक्तिपीठों पर जरूर लगाएं हाजिरी, पूरी होगी हर मनोकामना!

धर्म डेस्क। नवरात्रि का पर्व पूरे भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। खासकर अष्टमी के दिन मंदिरों और शक्तिपीठों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। भारत और दुनिया भर में कुल 51 सिद्ध शक्तिपीठ माने जाते हैं। ये स्थान सिर्फ पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि इनके साथ जुड़ी पौराणिक कथाएं और मान्यताएं इन्हें और भी खास बनाती हैं।

 

हरियाणा का सावित्री शक्तिपीठ
यह मंदिर थानेसर (कुरुक्षेत्र) में स्थित है और भारत के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। माना जाता है कि यहां माता सती का दाहिना टखना गिरा था। इसी कारण इस स्थान को सावित्रीपीठ, देवीकूप और कालिकापीठ भी कहा जाता है। यहां माता को सावित्री और भगवान शिव को स्थानु महादेव नाम से पूजा जाता है। मंदिर के पास का इलाका स्थानेश्वर कहलाता है, क्योंकि सावित्री के पति का नाम स्थानु था। महाभारत काल से यहां घोड़े दान करने की परंपरा चली आ रही है। कहा जाता है कि पांडवों ने विजय के बाद यहां घोड़े दान किए थे।

पंजाब (जालंधर) का मां त्रिपुरमालिनी देवी मंदिर
पंजाब के जालंधर शहर में स्थित यह शक्तिपीठ देवी तालाब मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यता है कि यहां माता सती का बायां स्तन (वक्ष) गिरा था। यह मंदिर जालंधर रेलवे स्टेशन से सिर्फ 1 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में है। यहां देवी को त्रिपुरमालिनी और भैरव को उनके भयंकर रूप में पूजा जाता है। इस शक्तिपीठ को त्रिगर्त तीर्थ भी कहा जाता है। नवरात्रि और अन्य खास अवसरों पर हजारों श्रद्धालु यहां आकर मां का आशीर्वाद लेते हैं।

 

राजस्थान का मणिबंध शक्तिपीठ (गायत्री शक्तिपीठ, पुष्कर)
यह शक्तिपीठ अजमेर के पास पुष्कर में स्थित है। यहां देवी सती की कलाइयाँ (मणिबंध) गिरी थीं। इसी कारण इसे मणिबंध शक्तिपीठ या गायत्री शक्तिपीठ कहा जाता है। यहां माता को गायत्री स्वरूप में पूजा जाता है। यह स्थान गायत्री मंत्र साधना का प्रमुख केंद्र भी माना जाता है। अजमेर से करीब 11 किलोमीटर दूर गायत्री पहाड़ियों में बसा यह शक्तिपीठ श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

राजस्थान का अंबिका शक्तिपीठ (विराट नगर, भरतपुर के पास)
यह शक्तिपीठ विराट नगर (भरतपुर के नजदीक) स्थित है। पौराणिक मान्यता है कि यहां माता सती के पैर की उंगलियां गिरी थीं। यहां देवी को अंबिका और भगवान शिव को अमृतेश्वर स्वरूप में पूजा जाता है। जयपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूर यह मंदिर नवरात्रि और दीपावली पर भक्तों से खचाखच भर जाता है।

 

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